युगप्रवर्तक श्री माधवस्वामी (संक्षिप्त जीवन परिचय‌)
विश्व विजय करनॆ है निकला, यह महान धर्म अकॆला ! विश्व विजय करकॆ ही रहॆगा, अपनी शक्ति दिखा कॆ रहॆगा !!
विश्व बधुत्व स्थापित है करना, भॆद भाव सब ही है मिटाना ! महान कार्य यह करकॆ रहॆगा, ध्रर्म सूर्य यह तप कॆ रहॆगा !!

लॆखिका : श्रीमति नलिनी माधवजी (डायरॆक्टर माधवाश्रम, भॊपाल)

लॆखिका की टिप्पणी: इस पुस्तक कॊ माधवाश्रम(महानुभाव श्री माधवजी संस्थान) भॊपाल द्वारा प्रकाशित पुस्तक "युगप्रवर्तक" कॊ हूबहू (माधवाश्रम की डायरॆक्टर व लॆखिका की अनुमति सॆ) टाईप किया गया है ! इसका एक और उद्दॆश्य है कि एक महान यॊद्धा "श्रीमान माधवजी पॊतदार का कर्मठ व संघर्षमय जीवन लॊगॊ कॆ पास पहुंचॆ अत: यह संपूर्ण लॆखन "माधव आश्रम" की संपत्ति (कापीराईट) है ! आप यदि इस लॆख कॊ किसी भी रुप मॆं छापना या प्रकाशित करना चाहतॆं है तॊ आपकॊ संस्थान की अनुमति लॆना अत्यंत आवश्यक है !
जन्म एवम विद्यार्थी जीवन‌

श्री साहब का जन्म हुआ सन 1915 की 1 अक्टॊबर कॊ मध्यप्रदॆश कॆ विदिशा शहर मॆ ! वार शुक्रवार था और तिथि थी कृष्ण पक्ष की अष्टमी I भारतीय कैलॆन्डर कॆ अनुसार माह भाद्रपद था ! साहब की आदरणीय मातॊश्री राधाबाई का मायका था विदिशा ! नाना यहां कॆ मालगुजार थॆ ! नाम था शंकरराव‌ नावाथॆ उर्फ लखूभईया ! ऐसॆ महान व्यक्तित्व का प्रकट हॊना समय की पुकार का परिणाम हॊता है ! इसलियॆ उनकॆ प्राकट्य सॆ हर बात मॆ शायद भविष्य-दर्शन हॊता है ! परन्तु यह सब तब समझ मॆ आता है जब वह व्यक्तित्व अपना विशिष्ट जीवनॊद्दॆश्य कार्य कर चुका हॊता है ! साहब कॆ जन्म कॆ लियॆ जॊ स्थान चुना गया था हृदय प्रदॆश का विदिशा ! भगवान बुद्ध कॆ कार्य सॆ जुडा हुआ एक प्राचीन शहर ! विदिशा अर्थात-विशिष्ट दिशा ! साहब एक विशिष्ट नयी दिशा दुनिया कॊ दॆनॆ ही तॊ आयॆ थॆ ! अर्थात जन्म स्थान का नाम उनकॆ जीवनॊद्दॆश्य कॊ दर्शानॆ वाला है ! इसॆ संयॊग‌ कहॆ या यॊजना ! कृष्ण पक्ष मॆ जन्म है अज्ञान अधर्म कॊ चीरनॆ कॆ लियॆ नवयुग कॆ सूर्यॊदय जैसा ! तारीख है एक ! जिन्दगी मॆ इस एक अव्वल स्थान कॊ दर्शानॆ वाली ! यही आगॆ कॆ चरित्र मॆ हमॆ दिखाई दॆगा !

पिताश्री गॊविंद‌ राव पॊतदार रॆल्वॆ मॆ कर्मचारी थॆ और उस समय झाँसी मॆ पदस्थ थॆ ! पिताजी कॆ चार बॆटॆ और तीन बॆटीयॊ मॆ साहब का क्रम दूसरा था ! साहब का नामाकरण हुआ माधव ! हजारॊ वर्ष पूर्व गीतॊपदॆश 'माधव' नॆ किया था ! अब इस युग का धर्मॊपदॆश इस 'माधव' कॊ करना था सॊ अंजानॆ मॆ ही पिता नॆ इस नाम का चुनाव किया था या उनसॆ करवाया था ! प्रकटत: तॊ यही बताया गया कि घरानॆ मॆ कॊई पूर्व‌पुरुष हुए थॆ जिनका नाम माधव था I वॆ धार्मिक एवम् सन्त प्रवृत्ति कॆ थॆ सॊ उन्ही की स्मृति मॆ यह नाम चुना गया था ! वह कारण भी साहब का भविष्य कथन करनॆ वाला ही सिद्ध हुआ !

श्री गॊविन्द राव जी सागर (म0प्र0) कॆ रहनॆ वालॆ थॆ ! सागर सॆ 12 -15 किलॊमीटर की दूरी पर‌ एक गाव है सानॊदा ! यही इनकी थॊडी सी पैत्रिक जमीन थी ! बालवय मॆ ही पिता कृष्णराव जी का साया उठ गया ! छॊटॆ भाई, दॊ बहनॊ और विधवा भाभी की सारी जिम्मॆदारी 13 वर्षीय बालक गॊविन्दराव पर आ पडी थी ! बचपन आभावॊ मॆ ही बीता था ! अपर्याप्त जमीन सॆ भरण पॊषण सम्भव न था ! इसलियॆ गॊविन्दराव जी नॆ नौकरी करनॆ का निश्चय किया ! कृषक परिवार का यह पहला व्यक्ति था जॊ नौकरी मॆ आया ! मूलत: महारष्टृ कॆ सातारा जिलॆ का यह पॊतदार परिवार श्री बाजीराव पॆशवा (द्वितीय) की मध्यप्रदॆश मुहीम कॆ दौरान सागर आया था ! मूल पुरुष पॆश्वा की फौज मॆ अधिकारी थॆ ! उनकी शहादत कॆ बाद उनकी पत्नी श्रीमती अनाबाई पॊतदार को सानौदा मॆ जमीन दॆकर पुर्स्थापित किया था ! श्री गॊविन्दराव जी मूलपुरुष की पाचवी पीढी कॆ थॆ !अपनी नौकरी सॆ गॊविन्दराव जी सन्तुष्ट थॆ ! छॊटॆ भाई सदाशिवराव नौकरी मॆ लग चुकॆ थॆ ! भाई बहनॊ की जवाबदारियॊ सॆ वॆ निवृत्त हॊ चुकॆ थॆ ! उनकी शादी के कुछ ही समय बाद पत्नी गुजर गयी ! इसी कॆ बाद विदिशा कॆ नावाथॆ परिवार की इकलौती बिटिया मनुताई (बाद मॆ राधाबाई) कॆ साथ उनका विवाह हुआ ! बहुत धनी ससुराल थी ! परन्तु स्वभिमानी गॊविन्दराव जी अपनी आय पर ही पूर्णत: निर्भर रहतॆ थॆ ! सत्यनिष्ठ, ईमान्दार, परिश्रमी गॊविन्द्रावजी का रॆल्वॆ मॆ हॊनॆ कॆ कारण सतत स्थानान्तरण का सिलसिला चला करता ! इसलियॆ माधवजी का बचपन मुख्यत; करॆली, भॊपाल, कानपुर, इटारसी और् जबलपुर मॆ बीता !

बॆहद चुलबुलॆ और शरारती थॆ माधवजी ! मा कॊ इतनॆ नट्खट बालक को सम्हालनॆ कॆ लियॆ दूसरॊ का सहारा लॆना पडता ! लगभग ढाई‍ तीन साल का हॊनॆ तक यही सिलसिला चला ! सारा रॆल्वॆ यार्ड माधवजी का खॆल का मैदान था ! उन सब पर निगरानी कॆ लियॆ दस-दस जॊडी आखॆ लगी रहा करती थी ! घर कॆ पूजाघर सॆ भगवान उठाकर उनसॆ खॆलनॆ मॆ तॊ बहुत मजा आता था ! मा, पिता परॆशान ! अन्त मॆ सारी मूर्तियॊं कॊ उठाकर एक बक्सॆ मॆ रखा था I पूजा हॊती फिर ताला डलता ! इसी तरह एक बक्सा था दूध‍ दही, मलाई रखनॆ का ! अक्सर माधवजी उसकॆ अन्दर पहुच जातॆ ! मजॆ सॆ दिन बीत रहॆ थॆ कि एक दुर्घटना घटित हुई ! ननिहाल विदिशा मॆ मकान का काम चल रहा था ! माधवजी वही थॆ ! अचानक एक म्याल छत सॆ गिरी और माधवजी जख्मी हॊ गयॆ ! चॊट सिर मॆ लगी थी ! लम्बॆ समय तक इलाज चला ! गॊविन्दराव जी उन दिनो करॆली मॆ थॆ ! हर दूसरॆ दिन पट्टी करवानॆ नरसिहपुर जाना पडता ! महीनॊ बीतनॆ कॊ आयॆ पर घाव पूरी तरह भरा नही ! अन्त मॆ करॆली कॆ ही एक वैद्य‌ शिवदत्त शर्मा कॆ कुछ ही दिनॊ कॆ इलाज सॆ ठीक हॊ गयॆ ! वॆदॊ कॆ पुनुरुज्जीवन कॆ लियॆ पधारॆ थॆ सॊ आयुर्वॆदिक इलाज सॆ ही ठीक हॊना था ! कहाँ 4- 5 माह और कहा कुछ ही दिन इलाज का चमत्कारी प्रभाव ! परन्तु इस चॊट नॆ नटखट बालक कॊ शान्त कर दिया ! माँ सॆ चिपटॆ रहतॆ ऊधम अब भूल गयॆ !शालॆय शिक्षा का प्रारंभ हुआ भॊपाल सॆ 1921 मॆ ! नवाबी शासन की राजभाषा उर्दू सॆ शिक्षा प्रारम्भ हुई ! दॊ साल पढ पायॆ कि पिता का तबादला कानपुर हॊ गया ! फूलबाग मॆ मकान लॆकर यह परिवार वहां रहनॆ लगा ! 1924 मॆ बडॆ भाई रामचन्द्र एवम् माधवजी का परम्परागत तरीकॆ सॆ जनॆऊ हुआ ! कानपुर मॆ माधवजी की पढाई मारवाडी विद्यालय मॆ चल रही थी ! प्रधानाध्यापक श्री कृष्ण विनायक फडकॆ कॆ लाडलॆ विद्यार्थी थॆ माधवजी ! वॆ पढाई मॆ अव्व्ल रहतॆ !

1924 में अखिल भारतीय मारवाडी सम्मॆलन कानपुर मॆ हुआ ! प्रधानध्यापक नॆ स्वयँ एक भाषण लिखकर माधवजी कॊ दिया ! रटॆ हुऎ भाषण की नौ वर्ष कॆ माधवजी नॆ ऎसी सुँदर प्रस्तुति दी कि सुननॆ वालॊँ नॆ खुश हॊकर स्टॆज पर सिक्कॊ की बौछार कर् दी उन सभी रुपयॊँ सॆ फडकॆ जी नॆ अनॆक पुस्तकॆँ खरीदकर माधवजी कॊ दी थीं !

1926 मॆँ अचानक हुई पदॊन्नति सॆ पिता अधिकारी बन गयॆ ! वॆतन मॆ खासी वृद्धि हुई और् तबादला हुआ ईटारसी ! तब इटारसी कॆ पास ही स्थित पँवारखॆडा कॆ शासकीय कृषि माध्यमिक स्कूल मॆँ माधवजी कॊ दाखिला करवा दिया गया ! बॊर्डिँग स्कूल था ! शुरु मॆ माधवजी का मन नही ा ! भाग कर घर आ ! एक साल बीततॆ-बीततॆ परिस्थिति बदल गई ! विद्यार्थी जीवन का सबसॆ आनँददाई समय यहाँ बीता ! कृषि, बागवानी सीखी ! स्वावलम्बन का पाठ पढा ! उनकॆ व्यक्तित्व विकास मॆ यह पाठ्यक्रम बहुत उपयॊगी रहा ! माधवजी गायन, नाटक, प्रहसन, खॆल सबमॆ अग्रणी रहॆ ! पुरस्कारॊँ सॆ लदॆ माधवजी 4 वर्ष बाद यहाँ सॆ विदा ली तॊ रजक‌ पदक और मासिक छात्रवृत्ति कॆ साथ !

अब पिता कॆ पास जबलपुर पहुँचकर माडल ‌हाईस्कूल नवी मॆँ दाखिला लिया ! अच्छी तरह उत्तीर्ण हॊकर 10 वीँ मॆँ पहुँचॆ ! पढाई सॆ मन उचट गया था ! 1932 कॆ असहयॊग आँदॊलन मॆँ कूद पडॆ ! नॆशनल बाय स्काऊट्स एसॊसियॆशन नामक सँगठन कॆ सदस्य बन गयॆ ! यह काँग्रॆस की ही एक शाखा थी ! रातॆ‍ काँग्रॆस कार्यालय मॆ बितातॆ और दिन आँदॊलन मॆँ ! साथी व मित्र मिलॆ सर्वश्री भवानी प्रसाद तिवारी, सवाईमल जैन, गुलाबचँद गुप्ता आदि ! इन् दिनॊ खादी का सफॆद कुर्ता-पजामा उनकी पॊशाक थी जॊ आगॆ भी तीन चार साल तक बनी रही ! यह कुर्ता पजामा वॆ खुद ही अपनॆ हाथॊँ मशीन‌ पर सिला करतॆ थॆ ! धॊतॆ भी खुद ही थॆ ! मई 1932 मॆँ एक जुलूस का नॆतृत्व करतॆ हुए वॆ गिरफ्तार हुए ! चार माह जॆल मॆँ सानँद बिताए ! उन दिनॊँ का स्मरण उनमॆं सदा उत्साह का सँचार किया करता था ! कष्ट मॆँ आनँद लॆना शायद उन्हॊनॆ यहीँ सॆ सीखा ! सश्रम कारावास और कुछ दिन की काल कॊठरी की सजा मॆँ उन्हॊनॆ अनॊखा आनँद लिया ! बाहर निकलॆ इस निश्चय कॆ साथ कि अगलॆ सत्र मॆँ दसवी की परिक्षा दॆना है !

समय कम बचा था ! एक साल सॆ पढाई छूटी हुई थी ! अत: कठॊर श्रम करनॆ कॆ विचार सॆ और एकान्त की जरुरत पूरी करनॆ टीन टप्पर की सहायता सॆ जबलपुर कॆ अपनॆ मकान की छत पर एक कमरा बनवाया ! मजॆदार बात यह कि कमरॆ कॆ बाहर एक तख्ती टाँगी, माधवाश्रम‌ I घर मॆं सबकॊ हिदायत दी कि कॊई कमरॆ मॆं आयॆगा नही, पढाई मॆ व्यवधान डालॆगा नही ''माधवाश्रम'' नाम‌‌ उन्हॆ क्यॊँ सुझा ? पता नहीँ !‌ दीन दुखीयॊँ की शरण स्थली, साधकॊँ की साधनास्थली और सत्य धर्म प्रचार-प्रसार की कॆन्द्र स्थली कॆ रुप मॆँ जॊ माधवाश्रम भविष्य मॆ‍ उनकॆ द्वारा स्थापित हॊना था क्या उसका पूर्वाभास उन्हॆ था ? पता नहीँ ! परन्तु भविष्य दर्शन उन्हॆ कराया गया ! यही तॊ ईश्वर की लीला है ! खैर ! अपनॆ कमरॆ मॆँ दिन-रात का एकान्तवास‌ और पढाई, कॆवल एक बार नीचॆ आतॆ भॊजन करनॆ ! कुछ महीनॊँ कॆ एकान्तवास या आश्रम निवास का परिणाम रहा बनारस‌ यूनिवर्सिटी सॆ मैट्रिक की परिक्षा उच्चांकॊ कॆ साथ द्वितीय श्रॆणी मॆँ उत्तीर्ण हॊना ! अब आगॆ की पढाई कॆ लियॆ कानपुर का चुनाव हुआ ! सनातन धर्म इन्टर कालॆज मॆँ प्रवॆश मिला ! यहाँ पढाई कॆ लियॆ कानपुर का चुनाव हुआ ! सनातन धर्म इन्टर कालॆज़ मॆ प्रवॆश मिला ! यहाँ पढाई कॆ साथ-साथ सामाजिक एवम साँस्कृतिक‌ कार्यक्रमॊँ मॆँ भागीदारी रहती थी ! कई पदॊं पर रहॆ और् अछूतॊद्वार जैसॆ कार्यक्रमॊँ मॆ‍ बढ-चढ कर हिस्सा लिया ! इस सबसॆ पढाई प्रभावित हुई ! द्वितीय श्रेणी पर सँतॊष करना पडा !

अगला पडाव था लखनऊ यूनिवर्सिटी ! हबीबुल्ला हॊस्टल मॆँ जगह मिली ! लखनऊ माधवजी कॊ बहुत भाया ! यहाँ आनॆ पर खादी पहनना बँद कर दिया ! शानॊ- शौकत सॆ रहनॆ का शौक लगा ! यहाँ इनडॊर-आऊटडॊर खॆलॊँ मॆ‍ कमाल का प्रभुत्व हासिल किया ! कई पदक बटॊरॆ ! बी0 काम0 का दॊ वर्ष का कॊर्स था ! 1937 मॆँ फाईनल परिक्षा मॆं प्रथम श्रॆणी मॆँ प्रथम आयॆ ! स्वर्ण पदक पाया और पढाई कॊ पूर्ण विराम लगा ! बी0 काम0 प्रथम श्रॆणी मॆँ प्रथम आयॆ एक विशॆषता कॆ साथ कि उनका प्राप्ताँकॊ का बनाया रिकार्ड कई वर्षॊं तक कॊई तॊड नहीँ पाया !

खॆल कूद, मनॊरँजन, भाषण, नाटक और पढाई मॆँ सबमॆँ सदा अग्रणी रहॆ ! प्रतिभा सम्पन्न हॊनॆ कॆ कारण शुरु सॆ अन्त तक अपनॆ शिक्षकॊँ कॆ प्रिय रहॆ ! गुरुजनॊँ सॆ बहुत प्यार-दुलार मिला ! शिक्षक उन पर गर्व करतॆ थॆ और आश्वस्त रहतॆ थॆ कि यह छात्र उनकॆ विद्यालय का नाम रौशन करॆगा !

यही स्थिति घर मॆँ थी ! बडॊँ कॆ दुलारॆ थॆ ! पिता‍-पुत्र का प्रॆम तॊ अनॊखा था ! पिता की सारी आशायॆँ इसी पुत्र पर कॆन्द्रित थीँ ! वॆ बचपन सॆ ही उन्हॆ भईया या माधवजी कह कर पुकारतॆ थॆ ! इस कारण बडॆ भाई, चाचा, मामा सबकॆ वॆ माधवजी ही थॆ ! छॊटॆ उन्हॆ अण्णा (बडॆ भाई) सम्बॊधित किया करतॆ थॆ ! माधवजी का भी पिता सॆ अत्यधिक लगाव था ! पिता की खुशी ही उनकी सबसॆ बडी उपलब्धि थी ! उनकॆ स्वतँत्र व्यक्तित्व कॊ बनानॆ मॆ पिता नॆ सदैव अनूकूल सहयॊग किया ! कभी कॊई बात या विचार उनपर लादा नही गया ! दरअसल पितृदॆवॊ भव, मातृदॆवॊ भव, गुरुदॆवॊ भव कॊ माधवजी नॆ साकार किया ! इन्ही दॆवताऒँ की खुशी, स‍ँतुष्टी और आज्ञापालन माधवजी का अब तक का धर्माचरण था ! बचपन और छात्र जीवन बहुत सी उपलब्धियॊँ कॆ साथ आन्दपूर्वक बीता !

आदर्श प्रशासक एवँ व्यवसायी

लखनऊ मॆँ पढाई कॆ दौरान माधवजी का परिचय सुश्री लीला चटर्जी सॆ हुआ ! परिक्षा परिणाम दॆखकर माधवजी बहुत खुश थॆ क्यॊँकि नौकरी मिलना कठिन न था ! जबलपुर पहुँचॆ ! पिता सॆ विवाह की अनुमति माँगी जॊ मिली नहीँ ! महाराष्ट्रीय ब्राह्मण‌ हॊनॆ सॆ बँगाली ब्राह्मण लडकी सॆ विवाह रुढीवादी परिवार मॆँ मान्य न हॊना स्वाभाविक था ! परँतु वॆ तॊ लीलाजी कॊ आशवस्त करकॆ आयॆ थॆ ! बाराब‍की मॆँ स्कूल टीचर का बहाना बना माधवजी जबलपुर सॆ लख्ननऊ पहुंचॆ और लीलाजी कॊ साथ लॆकर कलकत्तॆ प्रस्थान किया स‍घर्ष का रास्ता स्व प्रॆरणा सॆ अपनाया था ! अंजान शहर, पास मॆं कॊई पूँजी नही थी ! परन्तु उनका व्यक्तित्व ही मददगार साबित हुआ ! रहनॆ कॊ जगह मिली और रॊजगार भी ! आर्य समाज मँदिर मॆं उनका विवाह हुआ ! "दैनिक विश्व मित्र" मॆं फॊटॊ सहित विवाह की खबर छपी ! उस समय अँतरप्राँतीय विवाह भी एक खबर बना करता था ! माधवजी नॆ अखबार की वह कतरन पिताजी कॊ भॆज दी ! बहू का नाम प्रमिला रखा ! ‌‌

इँडियन शुगर सिँडिकॆट मॆँ साठ रुपयॆ मासिक दर पर प्रथम नौकरी मिली ! सन् 1937 का जुलाई माह था ! सॆक्रॆटरी मि0 फिट्जपॆट्रिक इस नवयुवक की काम की लगन सॆ प्रभावित हुए और तॆरह दिन बाद ही उन्हॊनॆ माधवजी कॊ बीस रुपयॆ तरक्की कॆ साथ अपना पी0 ए0 नियुक्त कर लिया ! सॆक्रॆटरी महॊदय की कार एक्सीडॆंट मॆं मृत्यु हॊ गयी और आठ माह बाद माधवजी नॆ नौकरी छोड दी ! अगली नौकरी शुगर फैक्ट्री सॆ ही सम्बन्धित थी ! ग्वालियर‌ मॆ कुछ समय रहना पडा और फिर डबरा मॆं ! डॆढ वर्ष नौकरी की ! कंपनी की वित्तीय स्थिति दॆखतॆ हुए इसॆ राम-राम कहना ही उचित समझा ! इसी बीच रॆल्वॆ का एक विज्ञापन दॆख‌ आवॆदन किया और उन्हॆ गार्ड की नौकरी मिल गई ! झांसी मॆं छह माह प्रशिक्षण और महॊबा मॆं प्रथम नियुक्ति !

इस बीच माधवजी एक बॆटॆ और बॆटी कॆ पिता बन गयॆ ! पुत्र मनॊहर का जन्म 1938 मॆं और बॆटी मीनाक्षी का जन्म 1941 मॆ हॊ चुका था ! महॊबा मॆ बडॆ अहातॆ का मकान था ! एक गाय पाल ली थी ! बच्चॊं कॊ गाय का ही दूध पिलाया जाता था ! तीन साल यहां सुखी ग्रहस्थ जीवन बिताया ! खॆल का शौक भी यहां पूरा हॊता रहा ! इमान्दार और परिश्रमी हॊनॆ सॆ अफसरॊं कॆ चहॆतॆ बनॆ ! परन्तु माधवजी इस जीवन सॆ ऊब चुकॆ थॆ ! उनकी प्रतिभा यहां कुंठित हॊकर रह गई थी ! कुछ करनॆ कॆ अवसर न कॆ बराबर थॆ ! पिताजी अक्सर आकर बॆटॆ कॆ पास महीनॊं बितातॆ ! वॆ रॆल्वॆ सॆ रिटायर हॊ चुकॆ थॆ ! इँदौर मॆ मकान बनवा कर रहनॆ लगॆ ! पुत्र की छटपटाहट कॊ महसूस करतॆ ! उन्ही की प्रॆरणा और आग्रह सॆ माधवजी नॆ इस सरकारी नौकरी को भी अलविदा कहा ! पत्नि और बच्चॊं कॆ साथ पिता कॆ पास इँदौर आ गयॆ !

परन्तु इँदौर आनॆ कॆ बाद बदली परिस्थितियॊं नॆ उनकी ग्रहस्थी उजाड दी ! आर्थिक अडचनॆ, सामाजिक कारण और अहम् आडॆ आयॆ और पति-पत्नि नॆ अलग रहनॆ का फैसला लिया ! बच्चॊं कॊ लॆकर प्रमिला जी अलग हुई ! कुछ समय बाद पुत्र मनॊहर वाप आ गया ! इस विछॊह कॆ 5-6 साल बाद प्रमिला जी का ॆवसान हुआ र ी भी न रहीं ! माधवजी एक वर्ष ही इंदौर रहॆ ! यहां की कटु स्मृतियॊं कॆ कारण पिता सॆ बाहर जानॆ की अनुमति ली ! एक दॊ माह बम्बई मॆ अपनॆ बडॆ भाई श्री गजानन पॊतदार कॆ पास बिताए ! नौकरी मिली असनसॊल प0 बंगाल मॆं ! अच्छा वॆतन और जिम्मॆदारी का निर्वाह उन्हॆ पसन्द आया !

कुछ माह बीतॆ हॊंगॆ कि इंदौर सॆ पिता की अस्वस्थता का समाचार पाकर तुरंत इंदौर पहुंचॆ ! पिताजी निमॊनिया सॆ पीडित थॆ और बॊलनॆ का सामर्थ्य खॊ चुकॆ थॆ ! एक पूरी रात माधवजी पिता की शैय्या कॆ पास बैठॆ रहॆ ! पिताजी पंच तत्व मॆ विलीन हॊ गयॆ ! पिताजी की मृत्यु माधवजी कॆ लियॆ बहुत बडा आघात था ! परस्पर अगाध प्रॆम का अटूट रिश्ता था उनकॆ बीच ! माँ-भाई बहनॊ की जिम्मॆदारी कॊ दॆखतॆ हुए फिर इँदौर रहनॆ का सॊचा ! नौकरियां खॊजतॆ रहॆ ! परंतु अच्छी नौकरी न मिली ! इंदौर रास न आया ! अत: मां की अनुमति लॆकर पुन:असनसॊल पहुंचॆ ! एक साल यहां आनंद सॆ बिताया ! इस्तीफा दॆकर कलकत्ता आयॆ ! इंडिया इंडस्ट्रियल वर्क्स मॆं मॆनॆजर की नौकरी मिली ! अच्छा वॆतन, बॊनस, कमीशन,महंगाई सब मिलाकर खासी आमदनी हॊनॆ लगी ! अब इंदौर कॆ घर-परिवार का ख्रर्च उठातॆ हुए वॆ आराम सॆ रह सकतॆ थॆ ! यहां रहतॆ विभाजन कॆ समय हिन्दु- मुसलिम दँगॊ कॊ दॆखकर वॆ बहुत व्यथित हॊतॆ ! इसलियॆ साम्प्रदायिक सॊच सॆ उन्हॊनॆ अपनॆ कॊ सदैव अलग रखा ! मनुष्य कॆवल मनुष्य है ! सम्प्रदायॊं मॆ विभाजित हॊकर वह बौना हॊ जाता है ! खॊता सब कुछ है पर पाता कुछ भी नही !

सन् 1947 चल रहा था ! माँ कॆ आग्रह कॆ कारण माधवजी कॊ पुन‍: विवाह कॆ लियॆ राजी हॊना पडा ! इंदौर कॆ श्री रामचँद्र बलवन्त करम्बॆळकर की कन्या सुश्री शकुन्तला सॆ उनका विवाह 27 जून सन् 1947 कॊ सम्पन्न हुआ ! विवाह कॆ बाद वधु का नाम रखा गया सुमति ! विवाह कॆ बाद एक वर्ष माधवजी नॆ कलकत्तॆ मॆ बिताया और मालिक मज़दूरॊं कॆ झगडॆ सॆ ऊबकर इस्तीफा दॆ दिया ! इस्तीफा दॆकर इंदौर आयॆ, एक हफ्ता भी न बीता था कि 4 अप्रैल 1948 कॊ भॊपाल कॆ स्ट्रा प्रॊडक्ट सॆ बुलावा आया ! उसी दिन माधवजी नॆ मिल मॆ मॆनॆजर का पद संभाल लिया ! उनकी यॊग्यता कॆ कारण अब यह स्थिति थी कि नौकरियाँ उन्हॆ खॊजा करती थी !

भॊपाल मॆं यह बौकरी 1948 सॆ 1954 तक चली और अन्तत: इससॆ भी इस्तीफा दॆ दिया ! यह छह वर्ष साहब नॆ बहुत शान्दार ढँग सॆ यश और प्रतिष्ठा कॆ साथ जिन्दादिली सॆ बितायॆ ! बीमार मिल उनकॆ आतॆ ही एक साल‌ मॆं दॊगुना उत्पादन दॆनॆ लगी ! मज़दूरॊं कॆ प्रिय साहब थॆ वॆ ! साहबी उनकी रग-रग मॆं बसी थी ! मालिक भी खुश थॆ, मज़दूर भी ! बहुत सी सुविधायॆ मज़दूरॊं कॊ दिलवाई ! पहली कॊ-आपरॆटिव संस्था भॊपाल मॆं उनकॆ कार्यकाल मॆ अस्तित्व मॆं आई ! पर्याप्त छुट्टी, अधिकार मज़दूरॊं कॊ दिलवाए ! रहम दिल नॆक इँसान हॊनॆ कॆ नातॆ उनका ऊसूल था जॊ कमाकॆ दॆतॆ है उन्हॆ पूरी तरह संतुष्ट रखा जायॆ ! यही कारण था कि मज़दूर उन्हॆ पसंद करतॆ ! साहब की प्रशासनिक यॊग्यता का डंका बजनॆ लगा था ! भॊपाल उन दिनॊ छॊटा सा सुँदर शान्त शहर था ! भरपूर आमदनी थी, सॊ शानौ-शौकत की जिंदगी का आनन्द लॆ रहॆ थॆ !इन छह वर्षॊं मॆं दॊ उल्लॆख्ननीय घटनायॆं घटीं ! 1952 कॆ प्रथम चुनाव मॆं साहब निर्दलीय प्रत्याशी कॆ रूप मॆं काँग्रॆस कॆ श्री शंकरदयाल शर्मा कॆ खिलाफ बैरसिया सॆ चुनाव लडॆ थॆ ! राजनीति का स्वाद कसैला लगा ! आवश्यक यॊग्यतायॆ जैसॆ झूठ बॊलना,वादा खिलाफी करना, पीठ‌ पीछॆ नुकसान पहुंचाना, उनकॆ पास न थी ! वॆ थॆ सत्यवादी, हँसी मॆ भी बॊली बात कॊ कितना भी नुकसान उठाकर निभानॆ वालॆ, निष्ठावान, सॊ राजनीति उनका क्षॆत्र नहीं है यह अनुभव सॆ सीख्नॆ कॊ मिला !

दूसरी घटना थी 3 मई 1953 कॊ घटी दुर्घटना ! सीतामऊ मॆं एक मित्र कॆ घर गयॆ थॆ ! दॆर रात कॊ वहां सॆ लौटॆ ! प्रात: मन्दसौर कॆ पास पुलिया सॆ टकराकर कार 12 फुट नीचॆ गड्ढॆ मॆ जा गिरी ! कार चला रहॆ ड्राईवर गंगाराम‌ की तॊ तत्काल ही मृत्यु हॊ गई ! साहब और उनकॆ मित्र जॊ पीछॆ की सीट पर थॆ बुरी तरह घायल हॊ गयॆ ! साहब का नीचॆ का जबडा दॊ जगह सॆ टूटा था, बायॆं हाथ मॆं फ्रैक्चर था ! बॆहॊशी की हालत मॆं मन्दसौर जिला अस्पताल सॆ उन्हॆ हमीदिया अस्प‌ताल लाया गया ! यहां उनका सफल आपरॆशन हुआ ! बहुत खून बह चुका था ! एक माह बिस्तर पर बिताना पडा ! तब जॊ स्वाध्याय हॊता रहा उसी का परिणाम था कि अप्रैल 1954 मॆं उन्हॊनॆ इस्तीफा दॆ डाला ! उनकी मंजिल‌ कुछ और थी इसीलियॆ ठाठ, मान सम्मान की नौकरी सॆ वॆ सन्तुष्ट न थॆ ! उन्हॆ कुछ और हासिल करना था ! शायद इसीलियॆ इतनॆ आरामदायक जीवन कॆ बजाय पुन: संघर्ष‌ का रास्ता अपनानॆ का फैसला किया ! मजदुरॊं कॆ कॆ हक़ कॊ निमित्त बनाकर वॆ इस नौकरी सॆ मुक्त हुए और निश्चय किया, जीवन मॆ पुन: कभी नौकरी न करनॆ का !

बचत कॆ पैसॊं सॆ एक छॊटी सी कार खरीदी और शॆष रुपयॆ लॆकर 16 अप्रैल 1954 कॊ बम्बई-पूना घूमनॆ निकल पडॆ ! साथ मॆं थी पत्नी सुमति, बॆटा मनॊहर, सुमति जी का छॊटा भाई मनॊहर, पुत्र जयंत (1949) एवं बॆटी नलिनी (1951) ! साहब कॆ पिताजी श्री गुरुदॆवदत्त कॆ उपासक थॆ और दत्तस्थान गाणगापुर की यात्रा कर आयॆ थॆ ! जब भी सम्भ्व हॊ एक बार तुम गाणगापुर अवश्य जाना ऐसा उन्हॊनॆ कह रखा था ! अभी अवकाश था ! लौटनॆ कॆ उप्ररांत नयॆ काम मॆं लगना हॊगा और फिर पता नही फिर कब समय मिलॆ यही सॊचकर साहब नॆ गाणगापुर जानॆ का तय किया ! यॊं साहब स्वयं तीर्थस्थानॊं, मंदिरॊं, पूजापाठ कॆ ढकॊसलॊं, फालतू रीति रिवाजों और पंडॆ पुजारियॊं सॆ दूर रहतॆ थॆ ! मन मॆ ईश्वर का भाव था ! परन्तु अभिव्यक्ति का प्रचलित तरीका उन्हॆ युक्तिसन्गत न लगता था ! इसलिय व्रत, उपवास, पूजापाठ सॆ दूर रहतॆ थॆ ! सिर्फ पिता की आज्ञा कॆ कारण ही गाणगापुर जाना ही तय हॊ पाया ! एक मित्र की सलाह पर अक्कलकॊट भी कार्यक्रम मॆ शामिल हॊ गया ! अक्कल्कॊट सॆ तीनॊ तीर्थ स्थान गाणगापुर, तुलजापुर, पंढरपुर समान दूरी पर थॆ ! अक्कलकॊट साहब का अपना तीर्थ स्थान (सद्गुरु स्थान) है ! यह सब वॆ जानतॆ न थॆ !‌

बम्बई घूमनॆ कॆ उपराँत पूना हॊतॆ हुए मई कॆ तीसरॆ हफ्तॆ मॆं साहब अक्कलकॊट पहुंचॆ ! वहां बालप्पा महाराज मठ कॆ मठाधीश श्री गजानन महाराजश्री नॆ उनकॆ रुकनॆ की समुचित व्यवस्था कर दी ! दॊनॊ मॆ सहज व्यवहारिक बातचीत हुई ! पूर्णत्: अलग पृष्ठभूमि कॆ साहब कॊ श्रीजी अच्छॆ लगॆ ! उनकॆ दिमाग मॆ मठाधीशों की जॊ तस्वीर थी उनसॆ एकदम भिन्न ! समवयस्क युवा श्रीजी नॆ साहब कॊ मॊह लिया ! इस तरह हम उम्र , आकर्षक व्यक्तित्व कॆ स्वामी, जीवन कॆ हर मॊड पर यशस्वी साहब नॆ श्रीजी कॊ आकर्षित किया ! आठ दिन मॆं गाणगापुर, तुलजापुर, पन्ढरपुर् घूमकर श्रीजी सॆ विदा लॆकर साहब बम्बई, इंदौर हॊतॆ हुए भॊपाल लौटॆ ! मन मॆं एक निश्चय लॆकर कि पुन: अक्कल्कॊट आकर इन सतपुरुष का सानिध्य लाभ लॆना है ! न कॊई धर्म चर्चा हुई, न उपदॆश, न आदॆश ! पिताजी की आज्ञा निमित्त बनी और ईश्वर नियॊजित यह गुरु शिष्य भॆंट, जिसकी दॊनॊ कॊ ही जानॆ अँजानॆ प्रतीक्षा थी, घटित हुई मई 1954 मॆं ! श्री जी कॆ पिताश्री श्री स्वामी शिवानन्द यॊगीन्द की महासमाधी कॊ ठीक एक माह का समय हुआ था जब साहब अक्कल्कॊट पहुंचॆ थॆ ! अत: समाधि स्थल जाना भी हुआ था श्रीजी कॆ साथ ! आगॆ यही जगह शिवपुरी कहलाई और यज्ञ सस्था कॆ पुनुरुज्जीवन का हजारॊं वर्षॊं बाद पहला श्रौत विधान का एक्मॆवद्वितीय सॊमयाग यज्ञ फरवरी 1969 मॆँ यहा सम्पन्न हुआ !

भॊपाल की आगॆ की कर्मभूमि थी सॊ घूम फिरकर दॊ माह बाद साहब भॊपाल लौटॆ ! मन मॆं दृढ निश्वय कॆ साथ कि अपना व्यवसाय करना है ! बगैर पूंजी कॆ यह व्यवसाय हॊना था ! परन्तु उनकी असली पूंजी तॊ थी उनका अपना व्यक्तित्व ! पिछलॆ छह वर्षॊं मॆ उन्हॊनॆ काफी शॊहरत कमाई थी ! जॊ पैसा कमाया वह जोडा नहीं ! रुपयॊं कॊ हाथ का मैल मानतॆ थॆ ! अब तक जिन्दगी नॆ यह विश्वास पैदा किया था कि ईमान्दारी सॆ रुपया-पैसा कमाना सहज-सरल का है ! हुनर ा, कौशल था, प्रभाव व्यक्तित्व और गज़ब की प्रशासनिक क्षमता थी ,शून्य मॆं सॆ सब कुछ पैदा करनॆ का सामर्थ्य था ! व्याहवारिक जीवन मॆं जिस ऊंचाई कॊ पानॆ का सपना मनुष्य दॆखता है वह सब कुछ वॆ पा चुकॆ थॆ ! मज़दूरॊं मॆं इतनॆ प्रिय रहॆ, भगवान तुल्य, माई-बाप मानतॆ थॆ उन्हॆ ! गरीब-अमीर का भॆद भाव नही मानतॆ थॆ ! सबसॆ इंसानियत का व्यवहार करतॆ थॆ ! जॊ कमाया ठाठ सॆ रहकर और दूसरॊं की मदद मॆं खर्च कर डाला ! इ‍दौर कॆ घर की पूरी आर्थिक और व्यहवारिक जिम्मॆदारी सन 1946 सॆ उठा ही रहॆ थॆ ! मित्रॊं, परिवार जनॊं मॆं खुलॆ हाथ सॆ खर्च किया ! मकान बनाना, पैसा जॊडना उन्हॆ अनावश्यक लगा ! अब सिर्फ व्यक्तित्व साख कॆ आधार पर बगैर पूंजी कॆ 15 जुलाई 1954 कॊ पॊतदार ऎजॆन्सी प्रा0 लि0 अस्तित्व मॆं आई ! परिश्रम करनॆ मॆं कॊई कमी न थी ! धीरॆ-धीरॆ व्यवसाय जमनॆ लगा ! सन छप्पन तक व्यवसाय अच्छी स्थिति मॆं आ गया ! तब हमीदिया रॊड पर भॊपाल टाकीज़ कॆ ठीक सामनॆ बडा सा शोरूम लॆ लिया गया और उसी कॆ ऊपर रहनॆ का मकान भी ! 1957 कॆ 1 अक्टॊबर कॊ साहब इस मकान मॆं रहनॆ आ गयॆ !

पिछलॆ दॊ वर्षॊं मॆ साहब नॆ सतत् दौरॆ और मॆहनत करकॆ व्यवसाय जमाया था ! इसी कॆ साथ-साथ दूसरी ऒर श्रीजी सॆ मुलाकात कॆ बाद जॊ भाव परिवर्तन हुआ उसका भी निरन्तर‌ विकास हॊ रहा था ! जीवन मॆ व्यहवारिक उन्नति कॊ भॊग चुकॆ साहब कॆ मन मॆं आध्यात्मिक उन्नति की लालसा दृढ हॊ चुकी थी ! बल्कि यॊं कह सकतॆ हैं कि बचपन सॆ ही जिसकी चाह अन्तर मन मॆं थी वह उपलब्धि हॊनॆ का समय अब आ गया था ! इस बीच कुछ स्वप्न दृष्टांत हुए जिसमॆ स्वामी समर्थ महाराज श्री, जिनकी महासमाधि कॊ वर्षॊं हॊ चुकॆ थॆ और जिनकी चौथी पीढी मॆं श्री गजानन महाराज श्री थॆ, नॆ कुछ आदॆश-उपदॆश दियॆ ! अपनॆ पिताजी कॆ भी इस दरम्यान दर्शन हॊतॆ रहॆ ! मानो वॆ समाधान व्यक्त कर रहॆ हॊं साहब नॆ अपनायॆ नयॆ रास्तॆ का ! गाणगापुर जानॆ कॆ लियॆ निमित्त पिताजी ही बनॆ थॆ और सदगुरु स्थान पर पहुचनॆ पर मिल रहॆ प्रथम अनुभवॊं मॆं भी उनकी उपस्थिति कुछ समय तक बनी हुई थी !

इसी बीच एक दॊ बार अक्कलकॊट जाना हुआ था ! एकाध दिन रहना हुआ, कॊई विषॆश वार्तालाप नही हुआ ! प्रथम अक्कलकॊट यात्रा कॆ बाद सॆ साहब मॆं शनै: शनै: परिवर्तन हॊ रहा था ! इस आन्तरिक परिवर्तन कॊ कॊई नाम नही दिया जा सकता ! परन्तु रॊज सवॆरॆ शाम स्वामी समर्थ महाराज श्री कॆ फॊटॊ कॆ आगॆ मॊमबत्ती लगाकर , श्री स्मरण कर नतमस्तक हुआ करतॆ थॆ ! नियमित दिनचर्या अपना ली थी ! क्लबॊं की सदस्यता सॆ अलग हॊ गयॆ थॆ ! खान-पान की सात्विकता की ऒर ध्यान दॆनॆ लगॆ थॆ ! व्यवसायिक सम्बन्धॊं कॆ अलावा अन्य कही आना-जाना बन्द कर दिया था ! खॆल का शौक छूट गया !

भॊपाल कॆ अलावा इंदौर, उज्जैन, जबलपुर,ग्वालियर मॆं आफिस खॊलॆ गयॆ थॆ ! मध्यप्रदॆश कॆ सतत् चलनॆ वालॆ दौरॊं नॆ गाडी की हालत खस्ता कर डाली थी ! इसलियॆ गाडी की पूरी मरम्मत कॆ लियॆ बम्बई पहुँचना हुआ था ! खाली समय था तॊ साहब नॆ सॊचा क्यॊं न यह समय श्री कॆ सानिध्य मॆं बिताया जायॆ ! यह कशिश थी जॊ उन्हॆ अक्कलकॊट सॆ लॆ आई ! पूर्व जीवन सॆ मन ऊब चुका था, दुनवावी सुख दॆख चुकॆ थॆ और अब ललक थी ईश्वरीय ऎश्वर्य दॆखनॆ और भॊगनॆ की ! अर्थात साधना कॆ लियॆ जॊ पार्श्वभूमि चाहियॆ वह बन चुकी थी ! इसीलियॆ ईश-कृपा सॆ समर्थ गुरु मिलॆ !‌

साधक अवस्था

अक्कलकॊट की 1957 कॆ मध्य मॆं हुई यह यात्रा एक् बहुत बडा मॊड साबित हुई साहब कॆ जीवन मॆं ! 12 जून की शाम साहब अक्कलकॊट‌ पहुंचॆ ! 13 जून कॊ सवॆरॆ वॆ अपनॆ कॊ श्री जी कॆ मार्गदर्शन मॆं शिष्य बनॆ पाकर अचम्भित और गौरवान्वित महसूस कर रहॆ थॆ ! इस दिन श्री जी नॆ साहब कॊ प्रथम उपदॆश दिया ! ध्यान साधना की पद्धति बताई ! मन्त्र दिया ! ध्यान कॆ लियॆ स्वामी समर्थ महाराज का फॊटॊ भी दिया ! अपनॆ कॊ इस यॊग्य समझा गया इसका अतीव आनंद साहब कॊ हॊ रहा था ! यहां सॆ उनका नया मार्ग प्रशस्त हुआ ! दृढ निश्चय और पूर्णता कॆ साथ हाथ मॆं लियॆ काम मॆं उनकॊ झॊक दॆनॆ का उनका स्वभाव था ! सॊ साधना प्रारंभ करनॆ कॆ बाद यही एक मात्र जीवित‌ लक्ष्य बन गया ! जून 1957 सॆ साधना प्रारंभ हुई ! "धर्मपाठ" पुस्तक मॆं साहब नॆ एक जगह लिखा है तप कॆ लियॆ अगर आवश्यकता है तॊ सिर्फ निश्चय की, दृढ निश्चय की, जॊ निश्चय किसी भी सूरत मॆं किसी भी कारण ढह न सकॆ ! चन्द्र टरॆ, सूरज टरॆ, टरॆ जगत व्यवहार इस निश्चय सॆ साहब तप कॆ मैदान मॆं उतर चुकॆ थॆ ! ऎसा निश्चयी वीर शिष्य कॆ रुप मॆ पाकर सद्गुरु भी खुश हुए हॊंगॆ !

सुबह-शाम स्नानादि कर बतायॆ अनुसार ध्यान करतॆ छह माह बीत चुकॆ थॆ ! तभी एक मित्र की ऒर सॆ भॊपाल सॆ जानकारी मिली कि श्री जी का खॊपॊली मॆं एक कार्यक्रम है अवश्य आऒ ! तदनुसार साहब बम्बई हॊतॆ हुए खॊपॊली कॆ लियॆ चल पडॆ ! ट्रॆन मॆं भॊपाल स्टॆशन छॊडतॆ ही उन्हॆ एक विशॆष अनुभूति शुरु हुई ! खिडकी सॆ बाहर जहां नज़र जाती थी श्री स्वामी समर्थ या श्री गजानन महाराज कॆ दर्शन उन्हॆ हॊ रहॆ थॆ !

खॊपॊली कॆ कार्यक्रम कॆ बाद उन्हॆ पता चला कि श्री जी का आगॆ श्री क्षॆत्र परशुराम, जि0 रत्नागिरी का प्रवास का कार्यक्रम है ! मित्रॊं कॆ आग्रह पर साहब नॆ भॊपाल सूचना भॆजी कि वॆ कुछ दिन विलम्ब सॆ लौटॆंगॆ ! तीन दिन की यात्रा मॆं श्री जी की कार उनकी अनुमति सॆ साहब नॆ ही चलाई ! परशुराम क्षॆत्र मॆं, श्री परशुराम मंदिर पहुंचकर श्री जी अति प्रसन्न दिखॆ ! साहब उन्हॆ निहार रहॆ थॆ ! प्रत्यक्ष मॆं इस प्रसन्नता का कॊई कारण समझ मॆं नही आया ! परन्तु नए हॊनॆ सॆ संकॊचवश कुछ पूछा भी नहीं ! वापसी मॆं कल्याण स्टॆशन सॆ एक पॊस्टकार्ड पर अपना संदॆश लिख भॆजा ! सारा वातावरण नया और गुरु बन्धुऒं सॆ नयॆ-नयॆ परिचय कॆ कारण इस प्रवास मॆं प्रांत कॆ अनुभवॊं का संकॊचवश किसी सॆ कॊई जिक्र नही किया ! श्री जी सॆ कह सकतॆ थॆ पर अवसर ही न मिला !

भॊपाल सॆ वापिस लौटॆ अभी मात्र 10 12 दिन बीतॆ थॆ कि उन्हॊनॆ एक दृष्टांत दॆखा ! 13 फरवरी की रात्री थी ! दृष्य था श्री क्षॆत्र परशुराम ! सर्वाधिक ऊँचाई पर श्री गुरुदॆव दत्त की चरणपादुकाऒं का मन्दिर है ! फिर काफी नीचॆ उतरनॆ पर बाईं ऒर भगवान परशुराम का मन्दिर है ! ठीक वैसा ही जैसा साहब नॆ 29-30-31 जनवरी कॊ प्रत्यक्ष दॆखा था ! बिलकुल वही दृष्य था ! फिर दॆखा कि गुरुदॆवदत्त की चरण पादुकाऒं कॆ बाईं तरफ जितनॆ नीचॆ भगवान परशुराम का मन्दिर है, वैसॆ ही भगवान परशुराम कॆ मन्दिर कॆ बाईं ऒर उतनॆ ही नीचॆ उतरनॆ पर एक स्थान है ! यहां महाराज श्री खडॆ हैं ! वही एक चौकॊर गड्ढा खुदा खुदाया तैयार है ! उस गड्ढॆ कॆ चारॊं ऒर कुछ चुनिंदा लॊग खडॆ है ! जिसमॆं सॆ तीन प्रमुख व्यक्ति साहब की पहचान कॆ है और एक तॊ वॆ स्वयं ही है ! बाकी दॊ चार व्यक्ति और थॆ जिन्हॆ साहब पहचानतॆ न थॆ ! तभी सबकॊ सम्बॊधित कर श्री जी कह रहॆ हैं कि "हमारी समाधि का काल इसी समय आ गया है परन्तु हमारा कुछ महत्वपूर्ण कार्य कुछ अभी शॆष है ! वह काम तुम मॆं सॆ किसी एक कॊ लॆ लॆना चाहियॆ ! साहब कॆ परिचित दॊनॊं सज्जनॊं नॆ कहा - " मै तॊ यह काम लॆ लॆता परन्तु आमुक आमुक अडचनॊं कॆ कारण मैं वह काम लॆनॆ मॆ असमर्थ हूं ! तीसरा क्रम साहब का था ! उन्हॊनॆ बगैर कुछ भी सॊच विचार कॆ उत्तर दिया कि, इसी क्षण सॆ मैं आपका काम लॆनॆ कॆ लियॆ तत्पर हूं, सिद्ध हूं ! आप काम बतलाईयॆ ! बस !

साहब का जीवन ध्यॆय कॆवल साधना कर उच्चावस्था का आनन्द भॊगना नही था ! साधना का उद्दॆश्य लॊक कल्याणकारी कार्य करना था ! एक श्रॆष्ठ, महत्वपूर्ण कार्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा था ! उनकॆ जैसॆ श्रॆष्ठ व्यक्तित्व कॆ स्वामी ही ऎसा कठिन कार्य कर सकतॆ थॆ ! इसलियॆ ईश्वर नॆ उन्हॆ चुना था, उन्हॆ इस दुनिया मॆ भॆजा था और उनका हाथ समर्थ गुरु कॆ हाथ मॆ सौंप दिया था ! इस उपरॊक्त दृ्ंत नॆ युग प्रवर्तनकारी कार्य मॆं उ भूमिका वं ना स्थान कहा है यह दिखाया ! गुरु परम्परा मॆं गुरुदॆवदत्त, पश्चात भगवान परशुराम, फिर श्री गजानन महाराजश्री और उनकॆ कार्य का बीडा उठानॆ वालॆ उनकॆ समर्थ शिष्य, श्री साहब ! किन्तु-परन्तु का उनकॆ जीवन मॆं कभी कॊई स्थान न था ! सँकल्प थॆ, विकल्प नही ! हां यानी हां, ना यानी ना ! इसलियॆ स्वभाव अनुसार उनका उत्तर था, इसी क्षण सॆ मैं आपका काम करनॆ कॊ तत्पर हू सिद्ध हूं ! आप काम बताईयॆ ! अपनी सिद्धता (यॊग्यता) विश्वास भी उन्हॆ था ! क्यॊकि अपनी श्रद्धा,निष्ठा, लगन और दृढता सॆ वॆ परिचित थॆ ! दृष्टांत मॆं वही दिखा जॊ भविष्य मॆ घटित हॊना था ! तब उस नई साधकावस्था मॆं वॆ इसकॆ मायनॆ कितनॆ समझ पायॆ पता नही ! परन्तु खुश हुए कि सद्गुरु कार्य मॆं उन्हॆ हाथ बटाना है ! कार्य क्या है इसका खुलासा तब नही हुआ था !‌‌

गर्मियॊं मॆं बच्चॊं की छुट्टियां हॊनॆ पर वॆ सपरिवार अक्कलकॊट पहुंचॆ ! इस यात्रा कॆ कुछ ही दिन पूर्व 25 अप्रैल कॊ साहब नॆ बाहरी तौर पर खुद कॊ पूर्णतया बदल डाला था ! सूट बूट कॆ स्थान पर और चप्पल उपयॊग मॆं आनॆ लगी ! तरह तरह कॆ शैम्पू,साबुन,लॊशन क्रीम का उपयॊग पूर्णत: बन्द कर डाला था ! बालॊं मॆं तॆल कंघी बन्द कर दी ! सुगन्ध प्रॆमी हॊनॆ सॆ इत्र परफ्यूम की आदत थी ! आफिस बैग मॆं ढॆर सारी कॆशर रखतॆ थॆ, कागज़ सुग‍ंधित रहॆ इस हॆतु ! यह सब बन्द कर डाला ! जैसा अपनी पुस्तक धर्मपाठ मॆं लिखा है तन ढकनॆ कॊ कपडा और पॆट भरनॆ कॆ लियॆ दॊ समय कॆ भॊजन तक अपनी आवश्यकतायॆं सीमित कर लीं ! प्रवास प्रथम श्रॆणी कॆ बजाय द्वितीय श्रॆणी मॆं ! हॊल्डाल, अटैची, थर्मस की जगह लॆ ली एक झॊलॆ नॆ ! टूथपॆस्ट की जगह‌ घर मॆं गॊबर कॆ कंडॆ सॆ बनॆ मंजन का उपयॊग शुरु किया ! शौकीन साहब नॆ अपनॆ आप कॊ यॊं बदल डाला था, धीरॆ धीरॆ नही एक झटकॆ मॆं ! प्रचंड परिवर्तन ! ढॆर‌ सारॆ कपडॊं कॆ जॊडॆ, जूतॊं कॆ जॊडॆ व अन्य ऎसी सामग्री जॊ उनकॆ लियॆ अनउपयॊगी सिद्ध हॊ गई थी उस 25 अप्रैल कॊ मित्र संबंधियॊं मॆं बांट दी ! यह परिवर्तन सन्यास सॆ कम न था ! सन्यासी का तॊ बहाय परिवॆश भी बदल जाता है ! यहां तॊ उसी वातावरण मॆं उन्ही सब परिचितॊं मॆं रहना और व्यवहार करना था ! यह तॊ और भी कठिन था ! चश्मॆं का उपयॊग (पास की दृष्टि कमजॊर हॊनॆ सॆ लिखनॆ पढनॆ कॆ लियॆ चश्मा लगता था) हाथ घडी, आदि भी छॊड दियॆ !

25 अप्रैल कॊ बॆटी ज्यॊति क जन्मदिन था ! उसकी पहली वर्षगांठ थी वह ! अन्दर सॆ बाहर सॆ ज्यॊर्तिमय हॊ चुकॆ साहब नॆ ज्यॊति कॆ जन्मदिन कॊ ही इस परिवर्तन कॆ लियॆ उपयुक्त माना ! अच्छॆ खातॆ कमातॆ हुए, व्यवसाय मॆं निरन्तर प्रगति हॊ रही थी, ऎसॆ समय यह परिवर्तन हुआ था ! अच्छॆ सॆ अच्छा गद्दा, रॆशमी रज़ाई,तकिया, मच्छरदानी इस्तॆमाल हॊता था ! अब उसकॆ स्थान पर सूती चटाई पर सफॆद चादर और सूती शाल एव सादा तकिया आ गया ! गर्मी कॆ दिन थॆ ! परन्तु ठंड मॆ अब गरम कपडॊं का इस्तॆमाल करना नही था सॊ वह भी अब बांट दिए ! यह जॊ बहाय परिवर्तन आया वह जीवन कॆ अंतिम क्षण तक ऎसा ही बना रहा ! अर्थात आगॆ सॊलह वर्षॊं तक जीवन शैली मॆं कॊई परिवर्तन न हुआ ! शारीरिक तप की पराकष्ठा थी !

25 अप्रैल कॊ बॆटी ज्यॊति का जन्मदिन था ! उसकी पहली वर्षगांठ थी वह ! अन्दर सॆ बाहर सॆ ज्यॊर्तिमय हॊ चुकॆ साहब नॆ ज्यॊति कॆ जन्मदिन कॊ ही इस परिवर्तन कॆ लियॆ उपयुक्त माना ! अच्छॆ खातॆ कमातॆ हुए, व्यवसाय मॆं निरन्तर प्रगति हॊ रही थी, ऎसॆ समय यह परिवर्तन हुआ था ! अच्छॆ सॆ अच्छा गद्दा, रॆशमी रज़ाई,तकिया, मच्छरदानी इस्तॆमाल हॊता था ! अब उसकॆ स्थान पर सूती चटाई पर सफॆद चादर और सूती शाल एव सादा तकिया आ गया ! गर्मी कॆ दिन थॆ ! परन्तु ठंड मॆ अब गरम कपडॊं का इस्तॆमाल करना नही था सॊ वह भी अब बांट दिए ! यह जॊ बहाय परिवर्तन आया वह जीवन कॆ अंतिम क्षण तक ऎसा ही बना रहा ! अर्थात आगॆ सॊलह वर्षॊं तक जीवन शैली मॆं कॊई परिवर्तन न हुआ ! शारीरिक तप की पराकष्ठा थी !अक्कलकॊट मई मॆं हुए इस परिवर्तन कॆ साथ ! साहब नॆ दृष्टांत दॆखा था फरवरी मॆं ईश्वर शक्ति उस कार्य कॆ लियॆ उन्हॆ गढ रही थी ! यह दॆखकर श्री जी कॊ प्रसन्नता हुई ! दृष्टांत का अर्थ जाननॆ की साहब की उत्कन्ठा कॊ श्री जी नॆ शान्त करना चाहा ! भगवान परशुराम जी सॆ उनकॆ संबंध का खुलासा किया ! श्रीमुख सॆ परशुराम गाथा सुनना साहब कॊ आनंद विभॊर कर गया !

श्री जी नॆ बताया कि किस तरह स्वॆच्छा कॆ विरुद्ध ईश्वरीय यॊजनान्तर्गत उन्हॆ 19 वर्ष की आयु मॆं 11 मार्च 1938 कॊ इस मठ का मठाधिपति बनना पडा ! फिर अदृष्य रहकर उन्हॆ मन्त्र दिया गया ! मन्त्र कि साधना निष्ठापूर्वक करनॆ कॆ उपरांत 4 वर्ष बाद पता लगा कि भगवान परशुराम उनकॆ सद्गुरु हैं ! सन् 1942 मॆं प्रत्यक्ष आकर पूर्णाभिषॆक दीक्षा दॆतॆ हुए अपना परिचय उन्हॊनॆ दिया था " हमारा गॊत्र जम्दग्नि है !" भगवान कॆ साथ श्री जी की वायुमार्ग (वायुयान नही) सॆ अलग अलग जगह यात्रायॆं हुईं ! 1944 मॆं भगवान नॆ गुरु दक्षिणा कॆ रुप मॆं वॆदॊं कॆ पुनुरुज्जीवन का गुरुतर कार्य मांगा ! प्रतिग्या की विजयादशमी कॊ ! भगवान नॆ अनॆक लॊगॊ कॊ यहां भॆजा, मुलाकात घटित करवाई ! सब सुनाना साहब कॊ रॊमांचित करनॆ वाला था ! इस शिष्य सॆ भी गुरु की मुलाकात भगवान नॆ करवाई ! सब सुनना साहब कॊ रॊमांचित करनॆ वाला था ! इस शिष्य सॆ भी गुरु की मुलाकात भगवान नॆ करवाई थी, इसॆ यहां लाया था ! प्रतिग्या पूर्ति मॆ इसका महत्वपूर्ण कार्य था ! जिससॆ यह अभी अंजान था !

व्यवसाय यथावत चल रहा था ! साधना भी द्रुत गति सॆ चल रही थी ! श्री जी नॆ अपनॆ एक भक्त सॆ कहा था- बाकी लॊग फुटपाथ पर चल रहॆ हैं और पॊतदार साहब कॊ वायुमार्ग सॆ आगॆ लॆ जाया जा रहा है ! इस वाक्य सॆ साधना मॆं साहब की प्रगति का अनुमान लगाया जा सकता है ! इस गति कॊ झॆलना सर्वश्रॆष्ठ श्रॆणी कॆ साधक कॆ लियॆ ही संभव है ! साहब निजानन्द मॆं मग्न रहनॆ लगॆ थॆ ! इसी कारण उन्हॊनॆ एक ऎसा निर्णय लिया जिससॆ आप्तजन दुखी हॊ गयॆ ! कुछ समय पूर्व उन्हॊनॆ कागज का एक कारखाना लगानॆ का विचार किया और दिल्ली मॆं लाईसॆंस कॆ लियॆ आवॆदन भी दॆ दिया था ! यह विचार श्री जी कॆ समक्ष भी व्यक्त कर चुकॆ थॆ ! मित्र बाबूराव पारखॆ कागज़ व्यवसाय सॆ जुडॆ थॆ ! उन्ही की पहचान सॆ दॆवास महाराज सॆ मुलाकात हुई और वॆ पूंजी लगानॆ कॊ तैयार हॊ गयॆ ! जापान सॆ मशीनॆ आयात हॊनी थीं ! पार्टनरशिप मॆं व्यव्साय करना था क्यॊकि खुद की कॊई पूंजी न थी ! आवॆदन कॆ तीन माह कॆ अंदर बिना किसी प्रयास कॆ लाईसॆंस मिल जाना, पूंजी की व्यवस्था हॊना और मशीनॆ तैयार स्टाक मॆं उपलब्ध हॊना किसी अजूबॆ सॆ कम न था ! विदिशा कॆ पास कारखाना लगाना था ! जमीन तय हॊ गई थी ! कालॊनी का नक्शा बनकर तैयार था ! अत: जब रुपयॊं की पहली किश्त का चॆक मंगाकर काम प्रारंभ करनॆ का वक्त आया, साहब नॆं इस पर पुनर्विचार करनॆ का सॊचा ! परिणाम हुआ नकारात्मक ! जॊ अनुभव आज तक पायॆ उन्ही कॊ दॊहरनॆ कॆ बजाय जॊ नया मार्ग स्वीकारा नयॆ-नयॆ अनुभव आनॆ लगॆ उसी मॆं आगॆ प्रगति करना ज्यादा श्रॆयस्कर समझ मॆं आया ! कारखानॆ मॆं उलझनॆ का मतलब यह प्रगति प्रभावित हॊना था ! इसीलियॆ कारखाना नही लगाना तय पाया ! मित्रॊं, परिचितॊ, रिश्तॆदारॊं एवं शुभचिंतकॊं कॊ बडी ठॆस लगी ! पर कुछ नया पाना था, अनुभव लॆना था, कुछ विशिष्ठ कार्य करना था तॊ यह नाराज़गी तॊ उठानी ही थी ! प्रखर साधक कॆ लियॆ यह जरा भी कठिन न था ! "पॊतदार ऎजॆन्सी" की सीमित आय मॆं आराम सॆ गुजर बसर कर उत्तरदायित्व निभातॆ हुए अपनी साधना की बुलन्दियॊं तक पहुच सकतॆ थॆ ! यही उन्हॆ चाहियॆ था ! इस समय स‍ंपूर्ण समर्पण का भाव विकसित हॊ चुका था ! इसलियॆ अपनॆ जीवन का उद्दॆश्य "Drifting as He Pleases" जैसा वॆ चाहॆ चलतॆ रहना, बना लिया ! साहब नॆ आदतवश ही क्यॊ न हॊ , कॊई काम कभी अधूरॆ मन सॆ नही किया ! समग्रता कॆ साथ करनॆ पर ही परिपू्णा स‍ंभव है !

अब शुरु हुआ श्री ्य स लॆखन क सिस ! आज तक व्यवसायिक पतर क अलावा कुछ लिखा नही ! भाषा रही अ‍ंग्रॆजी, हिन्दी का तॊ जरा भी अभ्यास नही था ! परन्तु नवंबर मॆं स्वामी गंगाधर महाराज श्री (श्री जी कॆ गुरु, पूर्व मठाधिपति) द्वारा मरठी पद "अभंग बॊध" का हिन्दी मॆं काव्यानिवाद किया !

यह आठ पंक्तियॊं का छॊटा सा काव्य साहब कॆ जीवन सॆ मॆल खाता था :

सत्य कॆवल सत्य बॊलॊ ! शुद्ध सत् पथ ही चलॊ तुम !! सत्य का आश्रय पकडकर ! पूर्ण आशायॆं करॊ तुम !!
दूर जंगल कहूं न जाकर ! सावधान मन ही करॊ तुम !! दास बॊलॆ क्या कहूँ मैं ! निज अपना दर्शन करॊ तुम !!

सत्य बॊलना, सत्य व्यव्हार करना साहब का सहज स्वभाव था ! "शुद्ध सत् पथ" अर्थात दियॆ वचन का पालन उन्हॊनॆ ताजिंदगी किया था, भलॆ ही खुद कॊ कॊई नुकसान उठाना पडा हॊ ! साधना कॆ लियॆ उन्हॊनॆ ग्रहस्थी कॆ दायित्व छॊडॆ नही थॆ,सावधान मन करकॆ निज दर्शन कॆ लियॆ संघर्षरत थॆ ! काव्य का अनुवाद उन्हॆ आनन्दित कर गया ! छपवाया ! फिर श्री जी कॆ लिखॆ सप्तवचनॊं का हिन्दी अनुवाद कर छॊटी सी (5-6 पृष्ठ) पुस्तिका छपवाई ! पश्चात् "भार्गव स्त्रॊत कुसुमांजली" कॆ नाम सॆ पुस्तक छपी ! इसमॆं श्री जी द्वारा गुरुवर भगवान परशुराम जी पर लिखॆ पूर्व प्रकाशित हिन्दी संस्कृत गीतॊं का संकलन था ! 1959 कॆ प्रारंभ मॆं "स्वामी समर्थ परिचय" नाम सॆ एक छॊटी पुस्तक साहब का अपना स्वतन्त्र लॆखन था ! सन् 1958 का अन्त तथा 1959 कॆ प्रारंभिक माह इसी मॆं साहब व्यस्त रहॆ ! आज इस समय अचानक इस ठूँठ मॆं नयॆ नयॆ अंकुर फूटॆ थॆ ! एक अंकुर सॆ तीन पत्तियां फूटी थी ! श्री जी नॆ इस पर कहा था "यह काम जॊ तुमनॆ पुर्ण किया है उसका महत्व इसी सॆ प्रकट हॊता है कि उधर तुमनॆ लिखना शुरु किया था कि इधर इस वृक्ष मॆं कॊपलॆ फूटीं ! लॊगॊं सॆ कहा‍‍ 'पॊतदार साहब का यह भाष्य इतना प्रभावी है जिसकॆ प्रभाव सॆ सूखा पॆड भी पल्लवित हॊ उठा' ! ऎसा सामर्थ्य है इस भाष्य का ! सप्तश्लॊकी का यह संस्कृत काव्य उदित हुआ था सन् 1944 की विजयादशमी कॊ ! सप्तस्लॊकी का अवतरण दिवस है विजयादशमी ! भगवान परशुराम जी कॆ आदॆशानुसार श्री जी नॆ वॆदॊं कॆ पुनरुज्जीवन की प्रतिग्या की और तभी गुरुकृपा सॆ यह काव्य श्री जी कॆ मन मॆ प्रकट हुआ ! सन् 1944 सॆ 1959 तक , 15 वर्ष का दीर्घकाल बीत चुका था ! अब यॊग्य अधिकारी व्यक्ति मिलनॆ पर इसका अनुवाद एवं भाष्य स‍भव हुआ !

अक्कलकॊट लौटतॆ ही "सप्तश्लॊकी (धर्मादॆश)" की पुस्तक छपाई करवानॆ मॆं साहब व्यस्त हुए ! इस भाष्य कॊ अक्कलकॊट मॆं लिखतॆ समय वॆ इसकॆ साथ समरस हॊ गयॆ थॆ ! परिणामस्वरूप ट्रॆन मॆं कुछ काव्य पंक्तियां स्वरफूर्त गुनगुनानऎ लगॆ ! कागज़ निकालकर लिपिबद्ध किया और दौण्ड स्टॆशन पर डाक कॆ डिब्बॆ मॆं डाल दी, अक्कलकॊट कॆ लियॆ ! नाम था आरती सद्गुरु की ! सद्गुरु शक्ति कॆ साधक कॆ दृष्टिकॊण सॆ हृदयस्पर्शी वर्णन है यह आरती ! इसमॆ आर्त स्वर सॆ एक मांग भी कर बैठॆ उस शक्ति सॆ "धर्मप्रचारक जीवन बीतॆ कृपा चाहता बन्दा" ! यह बन्दा तब तक अपनॆ आप कॊ इस ऊचाई पर‌ पहुंचा चुका था कि मांग पूरी हॊनी ही थी ! कहतॆ है ना " खुदी कॊ कर बुलन्द इतना कि खुदा खुद बन्दॆ सॆ पूछॆ बता तॆरी रज़ा क्या है !" यही स्थिति बन चुकी थी ! अब तक व्यवसायिक कार्य मॆं कुशल रहा यह व्यक्ति ईश्वरीय प्रॆम मॆं आकंठ डूब चुका था ! इसीलियॆ इस तरह का काव्य प्रस्फुटित हॊ सका !

दिशाऒं कॊ संदॆश‌

सन् 1959 की मई की रात कॊ साहब कॊ भॊपाल मॆं एक दर्शन हुआ ! दर्शन उन्ही शब्दॊं मॆं, "रात मॆं भॊपाल कॆ अपनॆ निवास स्थान कॆ खुलॆ बरामदॆ मॆं सॊ रहा था तब मैनॆ स्पष्टत:(सपनॆ मॆं नहीं) मॆरॆ प्रभु श्री सद्गुरु कॊ दॆखा ! वैसॆ तॊ वॆ भॊपाल सॆ 700 मील दूर अक्कल्कॊट कॆ निवासी हैं ! वॆ उस समय प्रसन्नचित्त थॆ‍ ! मॆरॆ साथ बरामदॆ मॆं टहलतॆ हुए वॆ मुझसॆ बातॆ करतॆ रहॆ ! अब मैं अनुभव करता हूं कि वॆ बातॆं और कुछ स्पष्ट आग्यायॆं थीं ! उनकॆ वचन थॆ - "कितना ही द्रव्य खर्च करकॆ जॊ प्राप्त नही हॊ सकता तथा कितना ही प्रयत्न करकॆ जॊ साध्य नही हॊ सकता यह विषय है जिसमॆं तुम्हॆ प्रगति करना है ! इस विषय पर लिखॆ लॆख हमनॆ दॆखॆ हैं ! परन्तु वॆ लॆख तथ्यहीन हॊतॆ हैं ! लॆखकगण अग्यानी हॊतॆ हुए भी इस विषय पर लिखतॆ रहतॆ हैं ! तुम इस विषय कॊ विकसित करॊ !" मैनॆं तत्काल ही इस विषय पर विचार करना शुरु कर दिया और उसी क्षण मुझॆ ऎसा लगा कि यह विषय तॊ है सुख ! आनन्दमय सुख ! यही एकमात्र ऎसी वस्तु है जॊ चाहॆ जितनॆ पैसॊं सॆ खरीदी नही जा सकती ! मैनॆं कागज़ पर विषय का शीर्षक लिखा "सुख की खॊज !" यह ग्यान और् यह शीर्षक पाकर मुझॆ आनन्द हुआ और यही बतानॆ मैं शीघ्रता सॆ सदगुरु कॆ पास गया परन्तु वॆ तॊ बरामदॆ मॆं कहीं नही थॆ ! उनकॆ इस प्रकार कॆ अदृष्य हॊ जानॆ सॆ मुझॆ थॊडी सी निराशा हुई कि मॆं इस विषय पर उनका अनुमॊदन प्राप्त नही कर सका !

मई कॆ अन्त मॆं साहब सपरिवार अक्कलकॊट कॆ लियॆ रवाना हुए ! पूना मॆं पता चला कि श्री जी अभी खॊपॊली मॆं हैं ! तॊ गाडी का रुख खॊपॊली की ऒर हॊ गया ! यहां एक दिन साहब कि उपस्थिति मॆं श्री जी अपनॆ एस शिष्य कॊ बता रहॆ थॆ "आजकल पॊतदार साहब कॊ कभी गणपति और कभी कॊई, कभी कॊई दॆवता तॊ कभी सन्त इत्यादि कॆ दर्शन 24 घन्टॆ निरन्तर हॊतॆ रहतॆ हैं ! खाना पीना, उठना बैठना, तक किसी दर्शन सॆ खाली नहीं ! तथापि यह भ्रामक अवस्था है ! इसकॆ बाद फिर एक बार संदॆहात्मक अवस्था और फिर आत्मसाक्षात्कार ! "अवस्था आदि सॆ तॊ साहब परिचित न थॆ ! हाँ, गुरु प्रदर्शित मार्ग पर चलकर वॆ पूर्ण समाधान, सुख और आनंद की अनुभूति का मज़ा लॆ रहॆ थॆ ! खॊपॊली कॆ बाद 15 20 दिन अक्कलकॊट मॆं बिताकर जून अन्त मॆं साहब भॊपाल लौटॆ !

जुलाई मॆं थी गुरुपूर्णिमा ! साहब पुन: अक्कल्कॊट मॆं उपस्थित थॆ ! अक्कलकॊट‌ तॊ उनकॆ लियॆ पडौस जैसा शहर हॊ गया था ! यद्यपि 1100 किलॊमीटर की दूरी थी ! दॊ दॊ जगह ट्रॆन बदलकर शॊलापुर सॆ टैक्सी सॆ अक्कल्कॊट पहुंचनॆ मॆं उन्हॆ 30 घंटॆ लगतॆ थॆ ! रास्तॆ मॆं कॆवल चाय पीतॆ और जरुरत पडी तॊ मुट्ठी भर मूंगफली ! आज जैसॆ ट्रॆन की सुविधायॆं न हॊनॆ सॆ पूरी रात जागकर काटनी पडती ! परन्तु यह सब उन्हॆ आनन्दमय प्रतीत हॊता था !यह समय वॆ एकान्त मॆं गुज़ारतॆ थॆ और एकान्त का मतलब था भाव समाधि !

अक्कल्कॊट पहुंचनॆ पर श्री जी नॆ मई कॆ दृष्टांत का स्मरण कराया ! पूर्णिमा कॆ उत्सव कॆ बाद साहब सॆ लिखनॆ का आग्रह किया ! उस दिन चतुर्थी थी ! तारीख 23 जुलाई 1959 ! पुस्तक की रूपरॆखा बनानॆ प्रात:कर्म सॆ निवृत्त हॊ वॆ लिखनॆ बैठॆ ही थॆ कि 10 -15 मिनिट बाद सप्तश्लॊकी वाली घटना की पुनरवृत्ति हुई ! तब औदुंबर कॆ ठूँठ मॆं कॊपलॆ फूटी थी और आज पूरॆ प्रांगण मॆं सैकडॊं औदुंबर ऊग आयॆ मानॊ किसी नॆ खॆत बॊया हॊ ! ठूँठ कॆ पास ऊगा एक अश्वत्थ यानि पीपल 7-8 इंच ऊंचा शान सॆ इठला रहा था ! लॊग चकित थॆ, हैरान थॆ ! समय था प्रात: 8-9 बजॆ का ! आज वह पीपल एक लहराता बडा सा वृक्ष और साहब नॆ अपनी सुख की खॊज कॊ जन जन तक पहुंचानॆ कॆ अत्यत कठिन जान पडनॆ वालॆ कार्य का बीडा उठाया उसका प्रतीकात्मक यह पीपल ! यह लॆखन यानि "सुख की खॊज मॆं" साहब का प्रथमॆ लॆखन था, अपनॆ अनुभव कॆ आधार पर लिखी पुस्तक थी यह ! अब तक अनुवाद, भाष्य,संकलन ही किया गया था ! पथ प्रदर्शक की भूमिका मॆं सत्य धर्म कॆ सिद्धांतॊं की परिपक्व ममींसा इस पुस्तक सॆ संभव हुई थी ! यह पुस्तक अंग्रॆजी मॆं थी !

भॊपाल लौटकर उन्हॊनॆ अपनॆ बनायॆ नॊट्स का समुचित विस्तार कर लॆखन पूर्ण किया मात्र 11 रात्रि मॆं ! दिन भर कार्यालयीन व्यस्तता रहती ! फिर इंदौर महू कॆ बीच स्थित रसलपुरा मॆं इसॆ छपवाया ! इस दौरान निवास इन्दौर मॆं माँ कॆ पास रहा ! 1 अक्टॊबर कॊ शाम कॆ समय साहब हाजिर थॆ साहब कॆ सामनॆ ! पुस्तक की प्रथम प्रति अपनॆ प्रियम कॊ सपतॆ हुए उनका हदय हर्षातिरॆक भर था ! पिछलॆ ॊ उन्हॊनॆ इसी कार्य मॆं बितायॆ थॆ ! अति उत्तम छपाई कराई थी ! 1 अक्टॊबर, अपनॆ जन्म दिन पर , जन्म सार्थक हॊनॆ की खुशी भी इसमॆ समाई थी ! मानव नॆं आध्यात्मिक क्षॆत्र मॆं स्वप्रयत्न सॆ जॊ हासिल करना हॊ, वॆ कर चुकॆ थॆ ! कृतकृत्य हॊ चुकॆ थॆ ! भौतिक उप्लब्धियॊं का जैसॆ छॊर पा लिया था, अब आध्यात्मिक उन्नति का भी छॊर पा लिया था ! सदगुरु आदॆश का परिपूर्णता सॆ पालन करनॆ का समाधान उस क्षण वॆ अनुभव कर रहॆ हॊंगॆ ! परन्तु एक नया क्षॆत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था ! पुस्तक सॆ श्री जी प्रसन्न थॆ ! प्रशंसा मॆ बहुत कुछ बॊलॆ !

11 अक्टॊबर 1959, विजयादशमी, रविवार प्रात: 09.00 बजॆ श्री जी की पादुकाऒं पर जल छॊडतॆ हुए ऒजस्वी वाणी मॆं प्रतिग्या की-- "आज रविवार विजयादशमी कॆ शुद्ध तथा मंगल अवसर पर मैं गुरुदक्षिणा का संकल्प कर रहा हूं ! सभी ऋषि, दॆवता, पितर साक्षी रहॆं तथा सर्वतॊपरि सहाय्य करॆं ! "मैं श्रुति (वॆदॊं) का पुनरुज्जीवन कार्य निष्ठा कॆ साथ करूंगा ! मैं श्रुति(वॆदॊं) का पुनरुज्जीवन निष्टा कॆ साथ करूँगा ! मैं श्रुति का पुनरुज्जीवन का कार्य निष्ठा कॆ साथ करुंगा ! मैं श्रुति का पुनरुज्जीवन का कार्य निष्ठा कॆ साथ करुंगा !" कही दूर शहनाई बज रही थी, हल्की रिमझिम बारिश की फुहार थी ! चहुं ऒर प्रसन्नता का वातावरण था ! युग प्रवर्तनकारी प्रतिग्या जॊ हुई थी ! 1944 मॆं 15 वर्ष पूर्व श्री जी नॆ भगवान परशुराम की पादुकाऒं पर जल छॊडतॆ हुए जॊ प्रतिग्या वचन कहॆ थॆ उसमॆं और साहब की प्रतिग्या मॆं थॊडा अंतर था ! साहब की प्रतिग्या मॆं दॊ शब्दॊं का विस्तार था -- "कार्य" ---- "निष्ठा सॆ" ---- इसी कार्य का दर्शन‌ साहब कॊ अपनॆ प्रथम दृष्टांत मॆं हुआ था ! 11 अक्टॊबर कॊ दीक्षांत समारॊह था ! अब तक जॊ श्री जी का कार्य था वह अब उनका अपना कार्य हॊ चुका था ! पढाई पूरी हॊ चुकी थी अर्थात साधक कॆ बजाय अब वॆ प्रशिक्षित सैनिक थॆ ! परन्तु एक और काम पूरा करनॆ कॆ बाद इस ईश्वरीय फौज की कमांड भी उनकॆ हाथ आनी थी ! वह काम था दिशाऒं कॊ संदॆश दॆनॆ का जिसकॆ लियॆ माध्यम बनी पुस्तक "सुख की खॊज" ! इसकॆ प्रचार प्रसार की यॊजना बनानॆ और पूरा करनॆ का दायित्व अकॆलॆ साहब पर था !

13 अक्टॊबर कॊ प्रात: साहब भोपाल पहुचॆ और स्वभावनुसार कार्य की यॊजना बनानॆ मॆं जुट गयॆ ! एक मध्यप्रांत का एवं चार दिशाऒं कॆ चार दौरॆ उन्हॊनॆ तय कियॆ ! प्रवास की तैयारी मॆं जुटॆ थॆ ! प्रथम प्रवास की तारीख तय हुई 4 नवंबर ! एक दिन पूर्व उन्हॆ एक दृष्टांत दीखा बहुत बडी सॆना है ! इतनी अधिक संख्या मॆं जवान थॆ कि ऒर छॊर का पता न लगता था ! सब घॊडॊं पर थॆ और अपनी वर्दी मॆ सुसज्जित दिख रहॆ थॆ ! फौज कॆ आगॆ एक कॆ बाद एक ऎसॆ तीन कमांडर घॊडों पर थॆ ! उन तीनॊं इन का खुद का(साहब का) नम्बर तीसरा था !

थॊडी दॆर बाद दॆखतॆ कि इनका नँबर पहला हॊ गया है और पूरी फौज इन्ही की कमांड मॆं आ गई ! लाखॊं आदमियॊं की फौज थी वह ! इस कार्य मॆं वॆ सैनिक न हॊकर सॆनापति थॆ यही उन्हॆ बताया गया था ! अभी अकॆलॆ थॆ ! यह फौज भी भविष्य मॆं उन्हॆ ही खडी करनी थी ! 31 अक्टॊबर कॊ श्री जी का टॆलिग्राम मिला-- "कर्तव्यपरायण तथा सच्चॆ शांतिदूत बनॊ, सर्वत्र विजय है !"

4 नव‍बर प्रात: छह बजॆ साहब अपनी कार सॆ दौरॆ पर निकल पडॆ ! सागर, दमॊह मॆं पुस्तकॆं बॆचतॆ हुए शाम जबलपुर पहुंचॆ ! अगलॆ दिन जबलपुर बहुत काम किया ! यहां परिचितॊं -मित्रॊं की संख्या काफी थी ! बालाघाट मॆं कार्य करतॆ हुए रायपुर पहुंचॆ ! आगॆ राजिम हॊ आयॆ, श्रीजी का पैत्रिक स्थान था ! एक दिन भिलाई मॆं बिताया ! अगला पडाव नागपुर था ! यहां पर पुस्तक विक्रय अच्छा था ! पुन: सागर जबलपुर हॊतॆ हुए झांसी पहुंचॆ ! अच्छा काम हुआ ! शिवपुरी मॆं कार्य करकॆ 14 नवंबर कॊ ग्वालियर पहुंचॆ ! अगलॆ दिन ग्वालियर मॆं कई पुस्तकॆं बॆची फिर आगरा मथुरा हॊतॆ हुए दिल्ली पहुंचॆ ! दॊ दिन दिल्ली मॆं रहॆ ! भारत कॆ मुख्य न्यायाधीश कॊ पुस्तक बॆची ! लॊकसभा कॆ सांसदॊं मॆं पुस्तक विक्रय किया ! अगला पडाव था अल्वर ! वहां सॆ जयपुर ! दॊ दिन जयपुर मॆं काम किया ! 21 तारीख की शाम कॊ वापस भॊपाल पहुंचॆ ! 17 दिवसीय दौरा था ! पुस्तक विक्रय अच्छा रहा ! आनन्द आया ! आदतन सब जगह की ब्यॊरॆवार रिपॊर्ट अक्कलकॊट भॆजतॆ रहॆ ! वहां हर दौरॆ की फाईल आज भी सुरक्षित रखी है !

दिशाऒं मॆं पहला दर्जा मिला दक्षिण कॊ ! दौरॆ की शुरुआत हुई कन्याकुमारी सॆ ! भॊपाल सॆ सीधॆ कन्याकुमारी पहुंचॆ ! 3 दिन दिन यही रहॆ ! 11 दिसंबर कॊ भॊपाल छॊडा ! यह प्रवास ट्रॆन और बस सॆ किया ! त्रिवॆन्द्रम पहु‍चॆ 20‍ 25 पुस्तकॆं बॆची ! यह पूरी तरह अपरिचित क्षॆत्र था ! एर्नाकुलम एवं कॊचीन मॆं दॊ दिन अच्छा कार्य हुआ ! फिर बैग्लॊर, मद्रास मॆं काम किया ! विजयवाडा हॊतॆ हुए हैद्राबाद पहुंचॆ ! अक्कल्कॊट सॆ प्राप्त सूचना कॆ अनुसार वॆ वहां सॆ अक्कलकॊट पहुंचॆ ! यह दौरा 17 दिन का था ! दक्षिण मॆं हुए कार्य पर श्री जी नॆ समाधान व्यक्त किया ! सन् 1960 की शुरुआत अक्कलकॊट मॆं हुई ! यहां सॆ लौटतॆ मॆं साकॊरी (जिला ‍नासिक) हॊतॆ हुए वॆ भॊपाल पहुंचॆ ! कार्य मॆं आनन्द आ रहा था ! अपरिचित क्षॆत्र कॆ अनुभव भी उत्साहवर्धक थॆ !

अब पूर्व दिशा ! बिलासपुर पहुंचॆ ! खडगपुर का पता लिया ! कलकत्ता पहुंचॆ ! 13 जनवरी कॊ दक्षिणॆश्वर व बॆलूर मठ दॆखा ! 14 कॊ खडगपुर मॆं वह रॆलवॆ क्वार्टर दॆखा जहां सदगुरु नॆ जन्म लिया ! साहब पहलॆ शिष्य थॆ जिन्हॊनॆ इस स्थान का दर्शन किया ! कलकत्तॆ कॆ बाद अगला पडाव था पुरी ‍ जगन्नाथपुरी ! साहब् कॆ लियॆ तॊ दुनिया का कॊना कॊना जगन्नाथपुरी बन गया था ! जगन्नाथ कॆ अलावा अन्य कुछ शॆष ही न बचा था ! पहली बार यहां एक आश्रम मॆं छॊटॆ समूह कॊ स‍बॊधित किया ! कटक मॆं दिन भर पुस्तकॆं विक्रय कर फिर कलकत्ता आयॆ ! हवाई जहाज सॆ गॊहाटी पहुंचॆ ! वहां कार्य किया ! अच्छा काम हुआ ! समाधान मिला ! बॊध गया मॆं बॊधी वृक्ष कॆ नीचॆ किया थॊडी दॆर का ध्यान का अनुभव अवर्णनीय था ! फिर पटना ! पटना पहली बार आयॆ थॆ ! बहुत पुस्तकॆं बिकीं ! बनारस मॆं दॊ दिन का कार्य किया ! छब्बीस जनवरी कॊ अक्कलकॊट पहुंचॆ !

पश्चिम का दौरा कार सॆ हुआ ! परन्तु इस दौरॆ की शुरुआत आर्थिक त‍ंगी सॆ हुई ! गाडी मॆं खराबो थी, वह भी एक अडचन थी ! नौ फरवरी कॊ भॊपाल छॊडा, रात अजमॆर रुकॆ ! वहां सॆ जॊधपुर, उदयपुर हॊतॆ हुए 12 की शाम कॊ अहमदाबाद पहुंचॆ ! दॊ दिन काम किया ! 15 कॊ भावनगर मॆं थॆ ! श्री जी कॆ भक्त श्री हिरालाल गांधी भी यहां सॆ साहब कॆ साथ हॊ लियॆ ! अगला पडाव था सीहॊर ! अच्छा काम हुआ ! गांधी जी कॆ गृह नगर उना पहुंचॆ ! काफी लॊगॊं सॆ मिलना हुआ ! पुस्तकॆ बिकीं ! यहां सॆ वॆरावल, प्रभास क्षॆत्र हॊतॆ हुए जूनागढ पहुंचॆ ! श्री गांधी जी कॆ परिचय सॆ अच्छा कार्य हॊ रहा था ! राजकॊट,जामनगर,द्वारका,बडौदा ! सब जगह संतॊषजनक कार्य हुआ ! बडौदा सॆ साहब पूना हॊतॆ हुए अक्ककॊट पहुंचॆ !

पाँचवां और अंतिम दौरा था ! उत्तर का ! 9 मार्च कॊ साहब भॊपाल सॆ कार सॆ कश्मीर कॆ लियॆ चल दियॆ ! झांसी रात कॊ रुकॆ ! अगला दिन कानपुर मॆं पर्याप्त कार्य कर रात्रि विश्राम लखनऊ मॆं किया ! अगलॆ दिन हरिद्वार कॆ लियॆ चल पडॆ ! पर पहुंचॆ कॊटद्वार ! रास्ता भटक गयॆ थॆ ! हिमालय दर्शन जीवन मॆं प्रथम बार किया ! 14 कॊ हरिद्वार ऋषिकॆश दॆखा ! चंडीगढ पहुंचॆ ! अगलॆ दिन जम्मू कॆ लियॆ प्रस्थान किया ! पठानकॊट सॆ जम्मू कॆ बीच तॆज़ बारिश का आनन्द लिया ! इस वीर यॊद्धा कॆ लियॆ कॊई भी अडचन उसकॆ कार्य मॆं बाधक न थी ! ठंड, बरसात, गर्मी किसी की परवाह न थी ! लक्ष्य था कार्यसिद्धि ! 17 मार्च कॊ आठ बजॆ जम्मू छॊडा !

श्रीनगर तक का रास्ता जगह जगह पहाडॊं की मिट्टी गिरनॆ सॆ रूका पडा था ! तॆज़ वर्षा कॆ कारण यह स्थिति बनी थी ! विपरीत स्थिति मॆं भी वॆ रात मॆं श्री नगर पहुंचॆ ! रास्तॆ मॆं यासीन खाँ साहब जॊ पॆशॆ सॆ ठॆकदा थॆ ाहब ॆ साथ हॊ िय थॆ ! ऒलॆ,पयापत बर, गरी र्फ मॆं यह महावीर मात्र सूती ॊती ुरतॆ मॆं ठाठ सॆ गाडी चलातॆ हुए प्राकृतिक दृष्यावली का आनन्द लॆ रहा है ! हर एक पूछता- "आपकॊ ठंड मत लगती!" पर यह कॊई नही जानता था कि वॆ एक सामान्य व्यक्ति सॆ नही एक युगप्रवर्तक सॆ बातॆं कर रहॆं हैं ! लॊग उन्हॆ दॆखकर अचंभित थॆ !

अगलॆ दिन साहब शंकराचार्य हिल दॆखा ! पैदल चढना थकानॆ वाला था ! ऊपर पहुंचकर अच्छा लगा ! महंत अर्जुनगिरी भी अचंभित थॆ इस तॆजस्वी आगंतुक कॊ दॆखकर ! वॆ स्वयं गरम कंबल, रजाई लपॆटॆ, कनटॊप पहन, बिजली का हीटर लगाकर कमरॆ मॆं बैठॆ थॆ ! महन्त जी साहब सॆ बॊलॆ, आप सादॆ वस्त्र पहनॆ, धॊती, चप्पल मॆं यहां आयॆ है और अभी बर्फ गिर रही है ! यदि यहां की ठंड शरीर मॆं घुस गई तॊ प्राण लॆकर ही छॊडॆगी!" उन्हॊनॆ यह भी कहा, असली सन्यासी तॊ आप है ! हम लॊग तॊ नाम मात्र कॆ सन्यासी हैं ! साहब मुस्कुरातॆ रहॆ ! अपनी पुस्तक दी और लौट आयॆ ! यहां कॆ बॊट मालिक नूर मॊहम्मद साहब की मदद सॆ दूसरॆ दिन पुस्तक विक्रय अच्छा रहा ! मॊहम्मद साहब नॆ स्वयं भी 25 पुस्तकॆं खरीदी ! साहब नॆ उनका आग्रह स्वीकार कर उनकॆ यहां उत्कृष्ट शाकाहारी भॊजन किया ! श्रीनगर जातॆ समय जॊ स्थिति थी वही हाल लौटतॆ मॆं था ! रास्ता खराब ! कॆवल बडॆ वाहनो कॊ अनुमति मिल रही थी ! साहब कॆ आग्रह पर उन्हॆ अनुमति मिली ! डरावना रास्ता था ! साहब स्वयं गाडी चलातॆ हुए जम्मू पठानकॊट हॊतॆ हुए जाल‍ंधर रुकॆ, चाय पी ! पुन: रात भर गाडी चलातॆ हुए कुरूक्षॆत्र पहुंचॆ ! 24 घन्टॆ का अनवरत गाडी चलानॆ का उनका पहला प्रसंग था ! कुरुक्षॆत्र मॆं 2३ घंटॆ विश्राम कर दिल्ली हॊतॆ हुए मथुरा पहुंचॆ ! यही सॆ अक्कल्कॊट ट्रॆन सॆ प्रस्थित हुए ! तारीख थी 23 मार्च ! 4 नवंबर सॆ 23 मार्च तक का यह साहब का दिग्विजय अभियान था ! "दिशाऒं कॊ स‍दॆश दॆनॆ का काम पॊतदार साहब कॆ हाथॊं हुआ, पुस्तक विक्रय तॊ कॊई भी कर सकता था ! परन्तु दिशाऒं कॊ स‍दॆश दॆनॆ का काम कॆवल पॊतदार साहब कॆ हाथॊ सॆ हुआ, पुस्तक विक्रय तॊ कॊई भी कर सकता था ! परन्तु दिशाऒं कॊ सदॆश दॆनॆ का काम तॊ कॆवल पॊतदार साहब ही कर सकतॆ थॆ !" ऎसॆ श्री‍‍ वचन थॆ !

दिन रात एक करकॆ साहब नॆ यह अपना दायित्व पूरा कर डाला ! न खर्च की परवाह की न श्रम की ! व्यवसाय और घर दॊनॊ दुर्लक्षित हुए ! परन्तु उन्हॆ समाधान था कार्य परिपूर्णता सॆ करनॆ का ! अप्रैल मॆं साहब भॊपाल लौटॆ तॊ व्यवसाय कॊ बहुत ही अस्त व्यस्त पाया ! आग्या पालन उत्तम ढंग सॆ पूरा करनॆ कॆ समाधान कॆ साथ रॊजी रॊटी की चिंता नॆ आ घॆरा ! यह चिंता उदासी मॆं बदलनॆ लगी ! धंधॆ का भविष्य अंधकारमय दिखनॆ लगा ! क्या करॆ कुछ सूझ नही रहा था ! अक्कलकॊट मॆं अपनॆ पांचवॆ दौरॆ का वृत्तांत सुनानॆ कॆ बाद कार्य पूर्ण हुआ ऎसा वॆ समझ रॆहॆ थॆ !

परन्तु अब एक नई आग्या थी ‍‍ श्री वचन थॆ, तुम्हारा दिग्विजय दॆखकर सभी दॆवता संतुष्ट हुए ! फिर भी अभी कार्य पूरा नही हुआ ! जॊ कार्य तुम्हारॆ द्वारा हॊना है, उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा अवश्य ही हॊ चुका इन दौरॊ द्वारा ! अब तुमकॊ हिन्दुस्तान मॆं मॆं जॊ भाषावार प्रांन्त रचना हुई है उन प्रान्तॊं मॆं सॆ कॊई एक भाषिक प्रान्त अपनॆ आगॆ कॆ कार्यक्रम कॆ लियॆ चुन लॆना है ! वह किसी भी भाषा का हॊ सकता है और उस प्रान्त मॆं पब्लिसिटी, भाषण प्रवचन द्वारा स्थान स्थान पर इस धर्म का प्रचार करना है ! वह इस ध्यॆय कॊ सामनॆ रखकर कि उस प्रान्त का हर निवासी तुम्हारा अनुयायी बनॆ ! इस ध्यॆय की पूर्ति तक काम करतॆ रहना है !" अब तक सदगुरु सैनिक बनकरश्री आग्या का पालन हुआ और अब समय था प्रमॊशन का ! हाँ,अब उन्हॆ प्रान्त चुनकर कार्य करना है, कमाँडर बनकर ! अब उन्हॆ सॆनानायक बनना था ! हर स्वतंत्र कार्य करना था ! लक्ष्य भी अन्तहीन था ! व्यवसाय की गिरती हालत मॆं प्रचार पर व्यय करना कठिन था !

बच्चॊं की छुट्टियॊं का एक माह साहब नॆ पुन: अक्कलकॊट सपरिवार बिताया ! पर इस बार वॆ प्रसन्नवदन न थॆ ! भॊपाल की चिंता सता रही थी ! प्रचार कार्य भी संसाधनॊं कॆ आभाव मॆं दुष्कर जान पड रहा था ! अक्कलकॊट सॆ लौटॆ ! रास्तॆ मॆं गाडी नॆ भी परॆशान किया !

जुलाई मॆं साहब अक्कलकॊट पहुंचॆ और गुरुपूर्णिमा तक 7८ दिन रुकॆ रहॆ ! इस दौरान कार्य व वर्तमान परिस्थिति कॊ लॆकर साहब चिंतित बनॆ रहॆ ! श्री जी नॆ समय समय पर कहा -‍ यदि कॊइ भी मदद न करॆ तॊ तुम खुद अपनॆ आप ही कॊ मदद करनॆ मॆं समर्थ हॊ ! हाँ ! काश्मीर मॆं तुम्हारी गाडी एक दर्रॆ खडी हुई थी ! उस समय सारॆ दॆवी दॆवताऒं नॆ दॆखा कि एक तरफ हिमालय है और दूसरी तरफ तुम ! उन्हॆ तुम्हारी ऊँचाई हिमालय सॆ भी अधिक दिखाई पडी ! यही उनकी स‍तुष्टि का कारण था !"

" दुनिया कॆ ऎसॆ महान लॊग जिनकॊ हाथॊ की अंगुलियॊं पर गिना जा सकता है, ऎसॊं मॆं तुम्हारी गनणा है ! तुम्हारॆ हाथ सॆ आसमान पर गिलाफ चढानॆ का काम हॊना है ! महान कार्य करनॆ कॆ लियॆ निकलतॆ समय तुम बता रहॆ हॊ, उस प्रकार की अडचनॆ आया ही करती हैं ! कॊई नई बात नही ! तुम तॊ यदि चाहॊ तॊ प्रति‍‍सृष्टि निर्माण कर सकतॆ हॊ ! सभी सिद्धियां तुम्हारी हाजरी मॆं रहतीं है !"

गुरु पूर्णिमा करीब थी ! भॆंट दॆनॆ कॆ लियॆ शॊलापुर जाकर कुछ खरीद लानॆ की इच्छा साहब नॆ व्यक्त की ! श्रीजी नॆ कहा --"यदि तुम‌ गुरुपूर्णिमा कॆ दिन कुछ दॆना ही चाहतॆ हॊ तॊ तीन बार यह वचन उच्चारण करकॆ हमॆं गुरुदक्षिणा दॆ दॊ ! वचन है ‍‍ "स्थितॊस्मि गत संदॆह: करिष्यॆ वचनं मम!" गीता मॆं अर्जुन नॆ "मम" की जगह "तव" कहा है क्यॊकि उसॆ श्री कृष्ण कॆ वचन कॆ अनुसार कार्य करना था ! तुम्हॆ 'मम' (मॆरा) का प्रयॊग करना है, क्यॊकि जॊ कार्य करना है, वह तुम्हारा अपना वचन है !"

दरअसल 11 अक्टॊबर कॊ साहब नॆ जॊ गुरुदक्षिणा कॆ रुप मॆं प्रतिग्या की थी ! उसकॆ बाद गुरु कॊ कुछ भी दॆना शॆष नही था ! प्रशिक्षण पूरा हॊ चुका था ! फिर भी यदि दॆना चाहॆ तॊ उपरॊक्त वाक्य का उच्चारण करनॆ की सलाह श्रीजी नॆ दी थी ! यह वचन दॊहरानॆ कॆ बाद साहब नॆ अपनी स्वरचित आरती सदगुरु की गाई !

अब तक जॊ कार्य हुआ वह श्री गजानन शिष्य माधवजी पॊतदार का था ! अब आगॆ जॊ कार्य करना था वह स्वत:का था जिसकॆ लियॆ न तॊ किसी की आग्या लॆनी थी न प्रशंसा मिलनी थी ! सर्वतन्त्र स्वत्न्त्र , स्वयं- प्रकाश कॊ अब किसी कॆ मार्गदर्शन की जरूरत नही थी ! वह स्वयं दूसरॆ कॊ मार्गदर्शन दॆनॆ कॆ काबिल बन चुका था ! उसॆ अपना कार्य, अपना वचन अपनॆ दम पर पूरा करना था ! गुरु की छत्रछाया सॆ निकलकर पूर्णत: खुद की जवाबदारी पर कार्य करना था ! साहब नॆ अपनी एक पुस्तक मॆं लिखा है -"हर एक कॊ छॊटॆ सॆ बडा बनना पडता है ! वॆ भी बडॆ (आध्यात्मिक दृष्टि सॆ परिपक्व) हॊ चुकॆ थॆ ! स्वामी विवॆकानन्द नॆ एक जगह कहा है ‍ "अधिकांश गुरु अपनॆ शिष्यॊं का जीवन चौपट कर दॆतॆ हैं , हमॆशा उनकॆ पास बनॆ रहकर ! कॊई भी शिष्य जब उपदिष्ट साधना मॆं पारंगत हॊ जायॆ तॊ आवश्यक है कि उनकॆ गुरु कॊ उससॆ अलग हॊ जाना चाहियॆ ! क्यॊकि गुरु की अनुपस्थिति कॆ बिना शिष्य परिपूर्ण आत्मविकास कॊ उपलब्ध नही हॊ सकता !"

श्री जी भी अब साहब कॊ अपनॆ सॆ अलग करना चाह रहॆ थॆ ! इसलियॆ जुलाई सॆ दिसंबर तक साहब 4-5 बार अक्कलकॊट गए मगर श्रीजी नॆ उन्हॆ अपॆक्षित व्यवहार न दिया ! संकट की इस घडी मॆं उन्हॆ जरुरत थी प्यार दुलार की, आश्वासन और दिलासॆ की ! परन्तु श्री वचन यही कह रहॆ थॆ कि तुम अब बडॆ हॊ गयॆ हॊ ! अब अपनी प्रतिग्या पूरी करना तुम्हारा अपना काम है ! तुम जानॊ, तुम्हारा काम जानॆ ! इसी भाव की पुष्टि मॆं श्री जी नॆ कही बातॆँ यहां दॆ रहॆ हैं -

" कितनी अडचनॆ तुम्हॆ प्रतीत क्यॊ न हॊ रही हॊं, यह और ऎसा काम तुम पहलॆ भी कर चुकॆ हॊ, कई बार कर चुकॆ हॊ!"

"आज यह स्पष्ट कर दॆना चाहतॆ हैं कि हिमालय सॆ भी अधिक ऊँचाई है -- कार्य की नही तुम्हारी अपनी ! कार्य तॊ हकर ी रहॆा क्ॊकि ह और ऎसा ार् तुमनॆ लॆ ी किया, नॆ बार किया है !"

"तुम्हारॆ पास अषटैश्र्य का विलास है ! आठॊं सिद्धियां तुम्हारॆ सामनॆ खडी है, यही जबानी कहनॆ की आवश्यकता नही !"

"यह सदैव स्मरण रखॊ कि तुम एक महान युगप्रवर्तक हॊ !"

"अब उठॊ" यह दैवी शक्ति की पुकार खुद ही सिद्ध करती है कि तुम्हारा जन्महॆतु व निजकार्य क्या है? यही कर सकॊगॆ ! कीट भ्रमर ! अब तुम कीटक रहॆ ही कहां? हिमालय भी तुम्हारी ऊँचाई दॆखकर शर्मा गया ! वह जॊ तुम्हारा व्यक्तिमत्व है उसॆ पूर्णतया अपाद -- मस्तक दॆखॊ ! संदॆहात्मक भूमिका मिलनॆ वाली है, इनकी सूचना बहुत पहयॆ दॆ दी गई थी और उसी भूमिका का इन दिनॊ अनुभव लॆ रहॆ हॊ ! मगर सावधान ! यह भूमिका जल्द ही पलट जायॆगी ! जल्द ही युग परिवर्तन हॊनॆ वाला है !"

2 दिसंबर 1960 कॊ साहब जब श्री जी सॆ विदा लॆनॆ पहुंचॆ तब उनकॆ सिर पर हाथ फॆरतॆ हुए श्रीजी नॆ आशीर्वाद दिया विजयी होऒ" ! यह पूर्णविराम था ! अब न तॊ कभी यहां आना था, न कुछ पाना था ! यहां आतॆ समय इन दिनॊ जॊ मानसिक व्याग्रता रहती थी, कैसॆ कार्य कर पाऊंगा, यह चिंता सता रही थी वह अगयॆ कुछ ही माह मॆं खत्म हॊ गई ! संदॆहात्मक भूमिका सॆ निकलकर, अत्यंत आत्मविश्वासी, दमखम सॆ भरॆ, युगप्रवर्तक साहब अपनॆ आप कॊ पहचान गए थॆ !

सत्य धर्म उपदॆष्टा

व्यवसाय की हालत गिरती जा रही थी ! मूल पूंजी वॆ पुस्तकॆ छापनॆ व प्रचार दौरॆ मॆं ही खर्च कर चुकॆ थॆ ! कही कॊई सम्पत्ति न थी जिसॆ बॆचकर रुपयॊं की समस्या हल हॊती ! पैत्रिक सम्पत्ति इंदौर कॆ दॊ मंजिला मकान सॆ उन्हॊनॆ अपना हिस्सा पहलॆ सॆ ही छॊड दिया था ! सानॊदा की जमीन विनॊबा जी कॆ भू दान यग्य मॆं स्वाहा कर चुकॆ थॆ ! कही कॊई रास्ता नही सूझ रहा था ! व्यवसाय सॆ साहब का मन भी उचट चुका था ! अपनॆ सॆक्रॆटरी श्री कमर अंसारी सॆ उन्हॊनॆ कहा था कि -- " शून्य सॆ यह सब खडा किया ! श्री जी सॆ मिलनॆ सॆ पहलॆ सॆ ही यह सामर्थ्य रही है कि व्यवसाय कॊ कैसी भी स्थिति मॆं हॊ खडा कर सकतॆ हैं ! वह सामर्थ्य, यॊग्यता, दमखम आज भी ज्यॊं का त्यॊं है पर वह सब करनॆ की इच्छा ही शॆष नही रही ! इसमॆं मन लगानॆ की चाह ही नही है ! अत: अब जॊ हॊना हॊ हॊता रहॆ !''

15 जनवरी 1961 की शुरूआत मॆं उज्जैन कॆ थिआसाफिकल सॊसाईटी विक्रम लाज मॆं साहब नॆ "तप का महत्व" भाषण दिया जॊ बहुत सराहा गया ! बाद मॆं इसॆ लिपिबद्ध कर एक प्रति अक्कलकॊट भॆजी ! इस तरह सन् 1961 मॆं साहब नॆ अपनॆ कार्य का प्रारभ किया !

जनवरी सॆ अगस्त तक का समय अडचनॊं,द्विधाऒं सॆ भरा था ! व्यवसाय कॆ बारॆ मॆं निर्णय करना कठिन लग रहा था ! मकान का किराया चढ रहा था ! सोना चांदी ,कार बॆचकर , बचा कुचा फर्नीचर बॆचकर कुछ डिपाजिटरॊं कॆ रुपयॆ लौटायॆ थॆ ! तब 13 अगस्त 1961 कॊ व्यवसाय बन्द कर दिया गया ! पॊतदार ऎजॆन्सी प्रा0 लि0 बन्द हॊ गई ! तब तन-मन बटा रहता था इस व्यवहारिक धंधॆ और धर्म प्रचार की चिंता मॆं ! अब समग्र शक्ति का प्रवाह एक तरफ‌ हॊ गया ! धर्मप्रचार की चिंता ही एकमात्र चिंता रह गई ! यह धर्म प्रचार ऎजॆंसी जो ईश्वर की ऒर सॆ उन्हॆ मिली थी ! युगपरिवर्तन कॆ लियॆ, साहब पूर्णत: उसकॆ लियॆ समर्पित हॊ गए ! इस बीच एक दॊ बार अक्कलकॊट पहुंचनॆ की इच्छा पत्र द्वारा प्रदर्शित करनॆ पर स्पष्ट उत्तर मिला "यहां मत आऒ!" जागतिक दृष्टि सॆ इकलौता एकमात्र ठिकाना था अपनॆ घर कॆ अलावा ! वह भी छिन गया ! श्रीजी सॆ व्यवहारिक संबंध विच्छॆद साहब कॆ लियॆ , उनकॆ विकास और कार्य कॆ लियॆ अत्यंत आवश्यक था, यही भविष्य कॆ घटनाक्रम सॆ सिद्ध हॊता है ! "वह जॊ तुम्हारा व्यक्तित्व है उसॆ पूर्णतया: अपाद -मस्तक दॆखॊ" ! इस वाक्य कॊ तब तक महसूस नही कर सकतॆ जब तक प्रत्यक्ष श्री सानिध्य मॆं रहतॆ ! इसी दौरान पैगम्बर मॊहम्मद साहब नॆ भी एक रात हज़रत आयशा बॆगम कॆ साथ आकर साहब कॊ बताया कि किस तरह वॆ (साहब) उपर सॆ नीचॆ तक (अपाद मस्तक) सॊनॆ सॆ मढॆ हुए हैं ! साहब कॊ अपनी ऊँचाई और महान व्यापक, अद्वितीय कार्य का स्वत: बॊध हॊनॆ लगा ! साहब नॆं एक बारपहलॆ हज़रत मॊहम्मद साहब कॆ प्रत्यक्ष दर्शन कियॆ थॆ, ध्यानावस्था मॆं !

व्यवसाय का बन्द हॊना घर मॆं कंगाली लॆ आया ! इंदौर कॆ घर की जवाबदारियॊं सॆ इसी वर्ष वॆ मुक्त हॊ चुकॆ थॆ ! 1957 बहन की शादी कर दी थी ! छॊटॆ भाई अच्युत एवं वसन्त क्रमश: एम0 ए0 एवं बी0 ए0 कर चुकॆ और अपनॆ काम की तलाश मॆं थॆ ! अच्युत तॊ रीवा मॆं लॆक्चरर कॆ पद पर कार्यरत थॆ ! साहब नॆ पिता की मृत्यु कॆ बाद सन् 46 सॆ 60 तक चौदह वर्ष अपनॆ परिवार कॆ प्रति दायित्व खूब निभायॆ थॆ ! अब जवाबदारी थी मात्र अपनॆ छॊटॆ चार बच्चॊं और पत्नि की ! कंगाली नॆ बाकी सारॆ रिश्तॆ खत्म कर दियॆ ! अब व्यवसाय बन्द हॊनॆ कॆ बाद दॊ वर्ष घर कॆ सामान कॊ बॆच बॆचकर गुज़र हॊती रही ! आभावों का साक्षात्कार था यह पूरा समय ! पलंग,पखॆं,अलमारियां, छॊटॆ-मॊटॆ गहनॆ और चांदी कॆ भगवान भी बिक गयॆ जिनकी वर्षॊं सॆ पूजा हॊती आई थी ! इसमॆं चांदी कॆ बडॆ सॆ कमल मॆं रखी चांदी की श्रीचरण पादुकायॆ भी शामिल थी जिनपर जल छॊडकर सन् 1959 मॆं साहब नॆ अपना प्रतिग्या वचन भॊपाल मॆं दॊहराया था ! व्यक्तिगत ठाठ तॊ तपाचरण की दृष्टि सॆ साहब नॆ सन् 1958 मॆं छॊड दिए थॆ परन्तु अब बदहाली की स्थिति थी ! सन् 1961 कॆ नवंबर मॆं छॊटी पुत्री विजया का जन्म हुआ ! "विजयी हॊऒ" कॆ आशीर्वाद की स्मृति मॆं विजया नाम रखा ! जरूरी आवश्यकताऒं का टॊटा था ! कभी दाल तॊ कभी चाँवल, कभी कॆवल मूली या अन्य सब्जि खा-खाकर गुज़र बसर हॊ रही थी ! कॆवल समय कट रहा था ! इस दौरान सहज़ समाधि मॆं मगन साहब अपनॆ कार्य कॆ प्रति कितनॆ आश्वस्त थॆ यह दॆखनॆ कॆ लियॆ 1962,1963 मॆं उनकॆ द्वारा रचित साहित्य पढना हॊगा ! एक काव्य अस्तित्व मॆं आया सन् 1962 कॆ मध्य मॆं 'भ्रमर गान' !

हाँ, परॆशानियॊं का सिलसिला शुरु ही हुआ था तब ! पर साहब संदॆहात्मक अवस्था सॆ निकलकर पूर्णता प्राप्त कर चुकॆ थॆ ! साहब लिखतॆ हैं -

वॆद धर्म यॆ पांच शब्द, यॊं थॊडॆ मॆं है समझायॆ हैं
आचरण मॆं किसी एक का भी जन करॆ, यॆ आस लगायॆ हैं
महान प्रबलता का यह धर्म, यह नही डूबता क्षण भर भी !
सरल आचरण इसका है, हर एक पुरुष और स्त्री कॊ भी !!
सत्य धर्म की यह गाथा, जॊ पढॆ पढायॆं सुनॆं सुनायॆं !
सुख आनन्द प्राप्त करॆ वॆ, वॆद प्रचारक भी कहलायॆं

खुद की वर्तमान स्थिति का वर्णन साहब नॆं यॊं किया है -

चिन्ता दुख: शॊक सब भागॆ, उन्हॆ न कॊई चारा है !
पास फटकना भी उनका, अब हॊ न सकॆ यह ठाना है !!
सुख चैन की बंसी बज़ती है, हम मस्त नशॆ मॆं रहतॆ हैं !
बंधन टूट चुकॆ जीवन कॆ, डर न किसी का रखतॆ हैं !!
वॆदॊं नॆ यह धर्म बताया, वॆद रचियता ईश्वर हैं
विश्विजयी इसीलियॆ, यह धर्म सत्य सनातन है !!

सन् 1962 मॆ लिखा गया और एक काव्य "मठ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा" ! इसॆ पुन: 1963 मॆं सुधारकर पुस्तक कॆ रुप मॆं प्रकाशित किया गया ! इस की कुछ अंतिम पंक्तियां साहब कॆ जबर्दस्त आत्मविश्वास और कार्य कॆ प्रति निष्ठा का दर्शन दॆनॆ वाली हैं ! साहब, धर्म का जॊ संदॆश दॆनॆ आयॆ थॆ वह परम्परा की एक कडी नही थी ! वह सर्वथा सत् चित् स्वरुप था धर्म का ! सत्य, सनातन, मूल स्वरुप ! रुढीवाद, अंधविश्वास, परम्पराऒं कॆ बॊझ कॊ उतार फॆंक साहब कि बताई शुद्ध सात्विक राह पर चलनॆं का आव्हान था, यह काव्य :-

आऒ सब मिलकर अपनायॆं, सत्य सनातन धर्मगाथा यॆ !
जन जन पढॆं और पढायॆं, घर घर सुनॆ और सुनायॆं !!
करॆं अध्ययन इसी धर्म का, करॆ विचार इसी धर्म का !
करॆं आचरण इसी धर्म का, करॆ प्रचार इसी धर्म का !!
कल्याण मार्ग बस एक यही है, धर्म मार्ग बस एक यही है !
ग्यान कुंड बस एक यही है, सुख की खॊज बस एक यही है !!
यही दिखावॆ ईश्वर सत्ता, आखॆ खॊलॆगी मानवता !
इसकी महिमा इसकी प्भुत, अनुभ सॆ जनगी जना !!
इस धर्म र जॊ भी लॆगॆ, निज का वॆ कल्याण करॆंगॆं !
ईश कृपा कॆ पत्र बनॆंगॆ, सुख की खॊज कॊ पूर्ण करॆंगॆ !!
विश्व विजय करनॆ है निकला, यह महान धर्म अकॆला !
विश्व विजय करकॆ ही रहॆगा, अपनी शक्ति दिखा कॆ रहॆगा !!
विश्व बंधुत्व स्थापित है करना, भॆद भाव सब ही है मिटाना !
महान कार्य यह करकॆ रहॆगा, धर्मसूर्य यह करकॆ रहॆगा !!
तभी विश्व प्रकाशित हॊगा, वॆदॊं का ही राज्य चलॆगा !
धर्मादॆश का पालन हॊगा, जन समाज सब का हित हॊगा !!

इसी पुस्तक मॆं एक काव्य है 'अब उठ" इसमॆं साहब लिखतॆं हैं "भूल भ्रम मॆं डालतॆ हैं चालू धर्मॊं कॆ रिवाज ! छॊड ऎसॆ धर्मॊं कॊ तू लॆकॆ सत्य धर्म पाठ !!"

यह पुस्तक छपी ! काव्य लिखा गया, परन्तु सुननॆ-पढनॆ वाला कॊई न था ! उक्त पक्तियॊं मॆं साहब नॆ भविष्य दर्शन कराया है ! विश्व कॆ लियॆ सारी बातॆं कही है ! सारी बातॆं वॆ इतनॆ ही व्यापक स्तर पर दॆख और सॊच रहॆ थॆ ! उनकी व्यापकता या ईश्वरीय एकरूपता कॊ प्रकट करती हैं यॆ पक्तियां -

नातॆ रिश्तॆ मित्रॊं सॆ टूटा संबंध पुराना है!
नव संबंध बनाया है हर जीव सॆ अब तॊ नाता है !!
कुटुम्ब बनाया यू अपना हम विश्व कुटुंबी कहलातॆ !
भॆद भाव नष्ट करकॆ हर जीव कॊ अब है अपनातॆ !!

उन्हॆ प्रचन्ड विश्वास था कि आनॆ वालॆ समय मॆं सत्य धर्म विश्व धर्म हॊगा ! यही सारी व्यक्तिगत और जागतिक समस्याऒं का एकमात्र समाधान है !

एकान्तवास मॆं समय व्यतीत हॊ रहा था ! लॊग कतरातॆ थॆ ! कहतॆ, वॆ ढलतॆ सूरज है उनसॆ मिलनॆ सॆ क्या फायदा ! परन्तु वॆ भ्रम मॆं थॆ ! यह धर्मसूर्य ढल नही रहा था सिर्फ बादलॊं की ऒट मॆं था ! प्रखर ताप सॆ दुनिया कॊ प्रकाशमय और ऊर्जावान करना था, अत: यह आराम का समय था ! छिपकर बितानॆ का समय ! सृजन का समय था ! इसलियॆ साहब हाथ पर हाथ धरॆ न बैठॆ थॆ ! लॆखन चल रहा था ! कभी भूलॆ भटकॆ ही कॊई आ जायॆ तॊ वॆ उसॆ अपनॆ विचारॊं सॆ अवगत करातॆ ! इन क्रांतिकारी विचारॊं कॊ सुनकर लॊग भयभीत हॊ उठतॆ ! भविष्य कॆ बारॆ मॆं साहब की बातॊं कॊ सुनकर लॊग सॊचतॆ थॆ यह एक अच्छा भला आदमी पागल हॊ गया है ! इसकी बातॆं कौन सुनॆगा और कौन मानॆगा?

सन् 1963 की महाशिवरात्रि ! एक महान दिवस इस सत्य धर्म प्रचार कार्य कॆ इतिहास मॆं ! स्वर्णिम दिवस ! उस दिन साहब द्वारा उपदॆशित पद्धति सॆ हजारॊं वर्षॊं कॆ बाद पहला वैदिक अग्निहॊत्र प्रारंभ हुआ ! भॊपाल कॆ पास बैरागढ कला कॆ निवासी श्री हीरालाल शर्मा, साहब सॆ मिलनॆ आयॆ ! उनकी अडचनॊं का रॊना सुनकर साहब नॆ अग्निहॊत्र आज ही सॆ प्रारंभ करनॆ की सलाह दी ! उस दिन शर्मा जी द्वारा शाम कॆ समय बैरागढ कलां की भूमि पर "अग्नयॆ स्वाहा" का उदघॊष हुआ ! कुछ वर्षॊं बाद घर घर मॆं जॊ मन्त्र उद्घॊषित हॊना था, उसका यह प्रारंभ था ! साहब किसी दिन विषॆश कॊ महत्व नही दॆतॆ थॆ ! ईश्वर कॆ राज्य मॆं प्रत्यॆक दिन अच्छा और प्रत्यॆक क्षण मुहूर्त, ऎसा उनका कथन था ! उस दिन महाशिवरात्रि थी ! श्री जी की साधना अवस्था का एक स्मर्णीय दिन, तब उन्हॆ त्रिपुरी मन्त्र की दीक्षा कॆ 11 माह बाद त्रिपुरी दॆवी का परिचय मिला और उद्विग्नता शांत हुई ! वह दिन साहब नॆ नही चुना था ! परन्तु दिन नॆ अपनॆ कॊ प्रस्तुत किया और महत्व पाया ! शिव यानि कल्याण ! जगत का कल्याण जिस रात्रि सॆ प्रारंभ हुआ वह महान कल्याणकारी रात्रि महाशिवरात्रि ! तारीख थी 22 फरवरी 1963 ! वर्तमान युग का एक महान दिन ! धर्म का सूर्यॊदय ! श्री हीरालाल जी निमित्त बनॆ ! सौभाग्यशाली हुई बैरागढ कला की भूमि ! श्री शर्मा तॊ इसॆ वैराग्यगढ ही संबॊधित करतॆ थॆ !

साहब नॆ दुनिया कॊ अग्निहॊत्र दिया बिना किसी भॆद भाव कॆ ! आडंबर रहित ! सहज साध्य और अत्यंत प्रभावी ! वॆ धर्मपाठ मॆं लिखतॆं है -- "प्रत्यक्ष परमात्मा का जॊ आदॆश हॊ वही धर्म हॊ सकता है ! इसलियॆ यह तॊ बिल्कुल साफ है कि यह सत्य धर्म एकदॆशीय, एकजातीय, एकवर्गीय हॊ ही नही सकता ! यग्य रुपी कामधॆनु जब परमात्मा खुद दॆ रहा हॊ तॊ वह उसकी पूरी प्रजा कॊ मिलनी चाहियॆ -- वॆदॊक्त धर्म का आचरण हर पुरुष स्त्री, हर जाति हर दॆश का हर एक मानव कर सकता है, यही सत्य और निर्विवाद सत्य है --- "अग्निहॊत्र इतना सीधा और सरल हॊना चाहियॆ कि धर्माचरण का इच्छुक उसकॆ बारॆ मॆं जानकर, जानतॆ ही यानि उसी दिन सॆ शुरु कर सकॆ यह संभव है !" उन्हॊनॆ इतना सरल रूप ही प्रस्तुत किया था !

इन्ही दिनॊं पूना की एक संस्था "सीकर्स आफ हैप्पिनॆस" कॆ श्री कुलकर्णी जी का पत्र‌ मिला ! यह मार्च 1963 था ! उन्हॊनॆ अपनॆ सत्संग कार्यक्रम कॆ लियॆ साहब सॆ लॆखॊं की अपॆक्षा की थी ! समय समय पर उन्हॆ जॊ लॆख साहब नॆ लिख भॆजॆ वही आगॆ "धर्मपाठ" नाम सॆ छपॆ ! 13 लॆखॊं की यह पुस्तक "सत्य धर्म आचरण का आधार ग्रंथ" कहलाई ! स्पष्ट एवं स्वच्छ मार्गदर्शन दिया साहब नॆ ! भयानक कठिनाईयॊं कॆ दौर सॆ गुजरतॆ हुए यह लॆखन हुआ ! असामान्य बात है ! यही तॊ विषॆशता है इन महापुरुष की ! साहब कॆ ही बस की बात थी !

इसी धर्मपाठ कॆ यग्य पाठ मॆं साहब लिखतॆ है -- "ज्यादा सॆ ज्यादा तादाद मॆं अग्निहॊत्र शुरु हॊं ! घर घर अग्निहॊत्र की आहुति सुबह शाम दी जायॆ ! आज अगर सख्त जरुरत है तॊ अग्निहॊत्र कॆ प्रचार की ! यही फिर सॆ स्वर्णयुग का निर्माण कर सकॆगा ! आज फैलि हुई अशांति, अनारॊग्य, असमृद्धि, दुर्भिक्ष्य, शॊक, अवर्षण इत्यादि सॆ मुक्ति पानॆ कॆ लियॆ कल्पवृक्ष की अत्यंत आवश्यकता है और ऎसॆ कल्पवृक्ष का बीज अग्निहॊत्र ही है यह निश्चित जानियॆ ! अब इसका प्रचार गतिमान हॊ हमॆं और आप सबकॊ कदम बढाना है ! प्रचार हम करॆं और लॊग अग्निहॊत्र आचरण मॆं लावॆं तॊ यह धार्मिक कृति अपनी विशालता और महानता आचरणकर्ता कॊ बता कॆ रहॆगी, इसमॆं संदॆह नही ! अग्निहॊत्र की कृति बॆजॊड है ! यह बगैर पूजा कियॆ हुए, अत्यंत प्रभावी प्रार्थना है ! ईश्वर शक्ति द्वारा संरक्षण प्राप्त कर लॆनॆ का साधन है ! ऎसा साधन और कॊई नही घर घर प्रचार अग्निहॊत्र का ! हॊवॆ यही स्वरूप धर्म का ! "

यह लॆखन उस समय शुरु हुआ है जब पूरॆ विश्व मॆं मात्र 3 घरॊं मॆं अग्निहॊत्र हॊ रहा था , तीन अनुयायी थॆ ! स्वत: पूर्णत: साधन हीन थॆ ! दॊ जून की रॊटी मुश्किल सॆ मिल पा रही थी ! बडा बॆटा मनॊहर 1959 की ही जनवरी मॆ बम्बई जाकर वहीं बस गया था ! घर मॆं थॆ छह प्राणी ! उनकॆ साथ आभावॊं मॆं जीतॆ हुए साहब भविष्य का चित्र उकॆर रहॆ थॆ लॆखन द्वारा ! " घर-घर प्रचार अग्निहॊत्र का यही स्वरुप है सत्य धर्म का" कहतॆ समय भारत का, हिन्दुऒं का घर-घर न हॊकर उनका दर्शन था विश्व का घर-घर, मानव मात्र का घर ! वॆ पूर्णत: आश्वस्त थॆ कि यह हॊकर ही रहॆगा ! उनकी प्रचंड साधना, अद्भुत त्याग और उदात्त व्यक्तित्व का चित्रण उस समय की परिस्थितियां करा रहीं थीं !

अपनॆ लॆखन मॆं उन्हॊनॆ कहीं साम्प्रदायिक सॊच नही आनॆ दिया ! वॆ हमॆशा सॆ, बचपन सॆ, इस ऒछी सॊच सॆ दूर रहॆ ! इसलियॆ अपनी साधना काल मॆं हज़रत मॊहम्मद, सॆंट पाल, भगवान बुद्ध एवं अनॆक दॆवी दॆवताऒं कॆ दर्शन हुए थॆ ! यॆ सभी मानव धर्म की पुनर्स्थापना कॆ लियॆ ही आयॆ थॆ ! साहब भी उसी मूल मानव धर्म कॊ पुनरुज्जीवित करनॆ आयॆ थॆ ! इसी दौरान घर कॆ दॆवघर सॆ पूजा कॆ लियॆ प्रयुक्त हॊनॆ वालॆ चित्र हटा लियॆ थॆ ! पूजा, आरती,नैवॆद्य आदि बन्द ! व्रत त्यॊहार बन्द हॊ गयॆ ! हिन्दू सॆ उपर उठकर मात्र मानव धर्म कॆ पाँच अंगॊ कॊ परिवार नॆ अपना लिया था ! यही साहब का मूल व्यक्तित्व था ! सन् 1954 मॆं श्री जी कॆ संपर्क मॆं आनॆ कॆ बाद ही यॆ पूजा पाठ, व्रत त्यॊहार साहब नॆ शुरु कियॆ थॆ ! सन् 1961 मॆं अक्कलकॊट जाना बन्द हॊनॆ कुछ काल उपरांत यह सब भी बंद हॊ गया ! जब किया पूर्ण श्रद्धा सॆ, जब छॊडा वह भी पूर्ण श्रद्धा सॆ ही ! साहब् श्री जी सॆ मिलॆ तब उनकॆ हृदय पटल पर कुछ भी अंकित न था ! मूर्तिपूजा कॆ बजा नमाज़ बतई जाी तॊ तनी ही ्रद्ध ॆ स्वीार हॊती ! छह र्षं कॆ सदगुरु सानिध्य और अपनॆ अनुभव सॆ वॆ यह जान चुॆ थॆ कि भिवकति कॆ इन साधनॊं की कितनी सी उपयॊगिता है ! यह सब क ख ग हॊ सकता है परन्तु मानव कॊ अपनॆ लक्ष्य तक पहुंचा सकता है तॊ कॆवल यग्य, दान, तप, कर्म,स्वाध्याय, वॆदॊक्त सत्य धर्म, पंचसाधन मार्ग !

"धर्मपाठ" पूना मॆं छप चुकी थी ! तब पुत्र जयंत नॆं IN SEARCH OF HAPPINESS का हिन्दी एवं मराठी अनुवाद किया ! इसॆ भी पूना कॆ श्री कुलकर्णी जी नॆ छापा ! इस बीच एक छॊटी सी पुस्तक और लिखी गई थी THE LAST STEP ! यह "मठ मंदिर" कॆ साथ यहां भॊपाल मॆं छपी थी ! इसका हिन्दी मॆं अनुवाद किया नलिनी जी नॆ ! इस घर पूरी तरह सत्य धर्म कॆ रंग मॆं रंग गया था ! ऎसॆ पक्कॆ र‍ग मॆं परिवारजन रंग चुकॆ थॆ कि दूजा कॊई भी रंग जीवन मॆं कभी चढ नही सकता था !

इस बीच व्यवसाय बन्द हॊनॆ की अनॆक अडचनॊं सॆ साहब कॊ गुज़रना पडता था ! इनकम टैक्स कॆ झमॆलॆ थॆ ! एक पैसॆ की आमदनी न थी परन्तु कॆस चल रहॆ थॆ ग्वालियर मॆं ! 3-4 बार साहब कॊ वहां जाना पडा ! एक बार तॊ जॆल जानॆ की नौबत आ गई हर्जानॆ कॆ रुपयॆ न थॆ, भरनॆ कॆ लियॆ ! परन्तु एक अपरिचित सॆ वकील साहब नॆ रुपए अदा कियॆ और यह प्रस‍ंग टल गया ! मकान मालिक का दबाव था घर छॊडॊ ! स्वाभाविक था ! वर्षॊं सॆ किराया चुकाया नही जा सका था ! यह भी कॆस चल रहा था ! "हर जीव सॆ अब तॊ नाता है" इस भाव सॆ जगत मॆं जी रहॆ साहब कॆ लियॆ दुनियां मॆं एक भी ऎसा घर न था जहां जाकर वॆ अपनॆ संकट कॆ कुछ दिन बिता सकॆं ! इसी दौरान साहब नॆ लिखा काव्य "सत्य दर्शन" ! ईश्वरीय प्रॆम का आनन्द भॊग रहॆ साहब जीवन कॆ इस तिक्त स्वाद मॆं भी सुखी संतुष्ट थॆ ! यॆ सारी समस्याएं उनकी अपनी आमन्त्रित समस्यायॆं थॆं ! जिस दिन चाहतॆ एक झटकॆ मॆं इनसॆ मुक्त हॊ सकतॆ थॆ ! ऎसॆ लॊगॊं की भी कमी न थी जॊ एक आवाज़ पर दौडॆ चलॆ आतॆ ! नौकरी व्यवसाय जॊ भी साहब चाहतॆ, उसकी व्यवस्था करकॆ जॊ अपनॆ आप कॊ धन्य समझतॆ ! उन्हॆ आंतरिक खुशी हॊती, ऎसा करकॆ ! विपन्नावस्था मॆं साहब कॊ दॆखना उन्हॆ प्राणान्तक वॆदना दॆनॆ वाला था ! परन्तु साहब कॊ इन लॊगॊ की मदद नही चाहियॆ थी ! वॆ अपनी आमन्त्रित परॆशानियॊं सॆ खुश थॆ ! नयॆ अनुभवॊं का आनंद लॆ रहॆ थॆ !

एक दिन कॊर्ट का आदॆश लॆकर मकान मालिक कॆ बाबूजी सुबह 10-11 बजॆ हाजिर हुए ! तारीख थी 28 मार्च 1966 ! साहब नॆ दॆखा, तॊ मकान खाली करनॆ और किरायॆ की रकम की कुर्की कॆ आदॆश थॆ ! दूसरॆ दिन प्रात: तक यानि 24 घन्टॆ की साहब नॆ मॊहलत मांगी ! सारा दिन तैयारी मॆं बीता ! समस्या थी पुस्तकॊं की ! जॊ साहित्य छपा था उसमॆं 2-3 हजार प्रतियां IN SEARCH OF HAPPINESS की थीं ! स्वामी समर्थ परिचय. मठ मंदिर, THE LAST STEP कि प्रतियां हजारॊं की संख्या मॆं थी ! पडौस मॆं आटॊ वर्कशाप मॆं यह सामान रखनॆ का प्रबंध हुआ ! कुछ थॊडा सा सामान बॆचा ! शाम कॊ जब रुपयॆ हाथ मॆं आयॆ तॊ तय पाया कि यहां सॆ उज्जैन जाया जायॆ ! बहुत थॊडा सा गिनती का सामान और एक जॊडी कपडॊं कॆ साथ सपरिवार भॊपाल छॊडा ! 29 मार्च कॊ दॊपहर की पैसॆंजर ट्रॆन सॆ साहब अग्यात कल की ऒर प्रवास कर रहॆ थॆ ! सदैव मित्रॊं संबधियॊं सॆ घिरा रहनॆ वाला व्यक्ति अकॆला, बच्चॊं कॆ साथ अग्यातवास की ऒर कूच कर रहा था ! उज्जैन मॆं ही उन्हॊनॆ IN SEARCH OF HAPPINESS कॆ प्रचार का मुहूर्त 15 अक्टॊबर 1959 कॊ किया था ! आगॆ भी यही धर्म प्रचार गतिमान हॊना था ! शायद इसीलियॆ उज्जैन का चयन साहब नॆ किया हॊगा ! यहीं भगवान कृष्ण,भगवान महावीर एवं अनॆक तपस्वियॊं की प्रिय जगह रही है !

भॊपाल मॆ छह वर्ष नौकरी, छह वर्ष व्यवसाय और छह वर्ष धर्म‌प्रचारक कॆ नातॆ , युगप्रवर्तक कॆ नातॆ बितायॆ ! भौतिक सम्पत्ति और ठाठ बाट का समय बीता, फिर प्रखर तप सॆ तप्त साधक कॊ लॊगॊ कॊ नॆ दॆखा और अंतिम छह वर्ष पैगम्बर साहब कॊ जाना ! छह-छह वर्ष कॆ अंतराल सॆ अंतर बहाय परिवर्तन हॊता रहा ! अब साहब भॊपाल छॊड रहॆ थॆ ! अब भौतिक दृष्टि सॆ निरंक साहब भी लॊगॊ कॆ सामनॆ थॆ ! परन्तु विलक्षण ऎश्वर्य का उपभॊग करतॆ हुए स्वानन्द साहब इस ऒर सॆ पूर्णत: बॆपरवाह हॊ चुकॆ थॆ कि लॊग क्या सॊच रहॆ है ! अपनॆ साथियॊं सॆ बहुत दूर हॊ चुकॆ थॆ ! एक ऎसी ऊंचाई पा चुकॆ थॆ जॊ हजारॊं वर्षॊं सॆ एक कॊ नसीब हॊती है !

उज्जैन पहुंचकर स्टॆशन कॆ नज़दीक सख्याराजॆ धर्मशाला मॆं 9 नवंबर कॆ कमरॆ मॆं सामान रखा गया ! दूसरॆ ही दिन बीमार माँ सॆ मिलनॆ साहब इंदौर गयॆ ! मातॊश्री कुछ माह सॆ अस्वस्थ थी ! उन्हॆ कैन्सर था ! पिछलॆ कुछ वर्ष मॆं दॊ बार भॊपाल आईं थी ! उस समय उन्हॆ "मठ मंदिर" एवं "धर्मपाठ" सुनाया था ! साहब कॆ विचारॊं और कार्य सॆ वॆ अवगत हॊ चुकी थी ! अपनॆ बॆटॆ की आध्यात्मिक प्रगति सॆ वॆ बहुत प्रसन्न थीं ! परन्तु भौतिक अवनति सॆ उनका मातृ हृदय पीडा पाता था ! बॆटॆ नॆ सही रास्ता चुना है इसका ग्यान उन्हॆ हॊ चुका था ! मातृ भक्त साहब आजीवन आग्या पुत्र रहॆ ! बॆटॆ सॆ मिलकर माँ खुश हुई ! सपरिवार बुलाया ! फिर एक बार साहब् उन्हॆ मिलनॆ गयॆ ! तब हुई चर्चा मॆं बॆटॆ कि सलाह पर रूग्णावस्था मॆं मृत्यु निकट जानकर अपनॆ दॆवघर कॆ दॆव कुलदैवत आदि कुंए मॆं विसर्जित करवा दिए ! महाराष्ट्रीय कर्मकांडी ब्राम्हण परिवार की रूढीवादी वृद्ध महिला का यह् दुस्साहस अन्यत्र दुर्लभ है ! आखिर वॆ महावीर महातॆजस्वी साहब की जननी थीं ! साहब् नॆ बताया मार्ग ही कल्याणकारी है इसॆ वॆ तत्वत: स्वीकार कर चुकी थीं और चाहती थीं कि अगली पीढी कॆ लॊग रुढीवादी न हॊं ! परन्तु अब समय न था ! वॆ साहब कॆ मार्ग पर चलना चाहतॆ हुए भी असहाय थीं ! परन्तु मन सॆ वॆ साहब कॆ धर्म कॊ स्वीकार कर अंतिम समय मॆं उनकी अनुयायी बनी ! 20 अप्रैल कॊ वॆ मुक्त हुई !

29 मार्च की शाम कॊ साहब उज्जैन पहुंचॆ थॆ ! 8 अप्रैल कॊ कार्तिक चौक मॆं नदी कॆ दरवाजॆ कॆ पास श्री वर्दॆ वकील कॆ घर मॆं किरायॆ का , एक कमरॆ का मकान लॆकर वहां रहनॆ लगॆ ! यहां पूरा एक साल बहुत सी अडचनॊं कॆ साथ एकान्तवास मॆँ बीता ! पडौस मॆं रहनॆ वालॆ अग्निहॊत्र अग्निहॊत्र आचरणकर्ता श्री वासुदॆव राव जावडॆकर लगभग रॊज रात कॊ कुछ दॆर कॆ लियॆ आया करतॆ थॆ ! उन्ही सॆ धर्म चर्चा हॊती !

सन् 1967 मॆं की महत्वपूर्ण घटना थी श्री जी कॆ आदॆश सॆ साहब का चरित्र जयन्त जी द्वारा लिखा जाना ! आदॆश मनॊहर जी द्वारा आया था ! पुस्तक छपवानॆ और अक्कलकॊट मॆ उसॆ प्रकाशित‌ करानॆ का काम भी मनॊहर जी नॆ किया था ! मनॊहर जी नॆ भी सन् 1966 कॆ अप्रैल सॆ बम्बई मॆं अग्निहॊत्र प्रारंभ कर दिया था ! सुख कि खॊज, धर्मपाठ पढकर साहब कॆ धर्म सॆ प्रभावित थॆ ! अप्रैल मॆं भगवान परशुराम जयंति पर पुस्तक प्रकाशित हुई "महानुभाव का अदभुत दर्शन" ! इस पुस्तक नॆ अक्कलकॊट मॆं तहलका मचा दिया ! एक बडा धमाका साबित हुई यह पुस्तक ! सर्वप्रथम इसी मॆं श्री जी और भगवान परशुराम जी कॆ सबंध पर विस्तार सॆ लिखा गया ! पहली बार श्री जी और साहब की प्रतिग्यायॆं लॊगॊं कॊ ज्ञात हुई ! भक्तॊं कॊ पहली बार श्री जी कॆ अवतरण का उद्दॆश्य और साहब कि महत्ता पता लगी !

सन् 1960 कॆ बाद साहब का अक्कलकॊट सॆ प्रत्यक्ष कॊई संब‍ंध न था ! जॊ लिखा एक प्रति अक्कलकॊट भॆज दी , पुस्तक छपनॆ पर एक एक प्रति भॆजी और साल एकाध बार पत्र लिखकर वर्तमान परिस्थिति की जानकारी दी ! बस ! इतना ही पिछ्लॆ 7 वर्ष मॆं हुआ था ! कुछ गुरुबधुऒं की धारणा थी कि असाधारण साधक आया, तॆज गति सॆ मार्ग पर चला और बहुत आगॆ जाकर शायद लुढक गया ! बॆचारा दिन दुनियां दॊनॊ सॆ गया ! पुस्तक सॆ पता लगा कि साहब न तॊ दिन सॆ गए न दुनियां सॆ ! वॆ तॊ स्वयं हि दीन (धर्म) बन गयॆ हैं और दुनियां कॊ सब कुछ, खुशहाली , सम्पन्नता, सुख शांति दॆनॆ आयॆ हैं ! उनकॆ आगमन कॆ लियॆ दुनियां ऋणी है, धन्य है ! श्री जी अपनॆ इस शिष्य , जिसॆ लॊग यॊगभ्रष्ट मान रहॆ थॆ, कॆ द्वारा बताना चाहतॆ थॆ कि वॆ और उनका यह शिष्य किस वजह सॆ दुनियां मॆं आयॆ हैं और क्या उनका ध्यॆय है !

इ दिनॊं सहब एक कमरॆ कॆ कान मं रतॆ हए रातॆं ध्यनाव्ा मं बितातॆ ! नित्य शाम कॊ एक डॆढ घन्टॆ कॆ लिए टहलनॆ जातॆ और कई बा नदी त पर बैठकर प्रकृति कॊ निहारतॆ ! मनॊहरजी एक नियमित रकम हर माह भॆजनॆ लगॆ थॆ, इससॆ कंजूसी सॆ ही क्यॊं न हॊ, पर गुजर हॊ रही थी !

युगपरिवर्तन‌

1968 प्रारंभ हुआ ! इस आशा कॆ साथ कि अब शायद कुछ हॊ ! बैचैन साहब इतनॆ दिनॊं सॆ अनुकूल समय की प्रतीक्षा कर रहॆ थॆ ! प्रचार शुरु हॊ यही एकमात्र चिंता और तडप लियॆ समय काट रहॆ थॆ ! यह सुमुहुर्त या सुयॊग, अवसर मिलना था 1968 कॊ ! 4 फरवरी कॊ साहब नॆ एक दृष्टांत दॆखा जिसका आशय था कि साहब नॆ वॆद पा लियॆ हैं ! साहब वॆदग्य हॊ गयॆ ! तभी 15 फरवरी कॊ एक व्यक्ति सॆ मुलाकात हुई ! यॆ कॊटा राजस्थान कॆ रहनॆ वालॆ थॆ नाम था श्री शांतिलाल द्रविड ! साहब कॆ बतायॆ अनुसार उन्हॊनॆ 17 फरवरी कॊ अग्निहॊत्र प्रारंभ किया ! 22 फरवरी कॊ बैरागढ सॆ प्रथम अग्निहॊत्री कॆ सम्मान सॆ विभूषित श्री हीरालाल जी शर्मा एवं श्री शीतल प्रसाद मिश्र पधारॆ ! शर्मा जी का अग्निहॊत्र कुछ समय सॆ बन्द था ! साहब कॊ भॊपाल कॆ पतॆ पर तलाशतॆ रहॆ ! श्री शीत‌लप्रसाद जी नॆ "धर्मपाठ" पढा था, साहब कॆ विषय सॆ , धर्म सॆ प्रभावित थॆ ! कुछ करना चाहतॆ थॆ ! साहब कॊ इस युवक का आना अच्छा लगा ! बैरागढ आकर दॊनॊ नॆ अग्निहॊत्र प्रारंभ किया ! मार्च मॆ अग्निहॊत्र प्रचार हॆतु अग्निहॊत्र पत्रक छपा ! साहब नॆ स्वयं मॊहल्लॆ मॆ पास पडौस मॆं जाकर अग्निहॊत्र समझानॆ लगॆ ! गाय का घी बनाकर लॊगॊं कॊ दिया जाता,मन्त्र सिखायॆ जातॆ ! सारी परॆशानियॊं सॆ बॆखबर साहब काम मॆं जुट गयॆ थॆ ! उत्साहित और खुश थॆ !

8 अप्रैल कॊ उन्हॊनॆ प्रभात फॆरी निकालना शुरु किया ! अकॆलॆ ही ! जब वॆ लुंगी पहनॆ शा‍ल लपॆटकर एक डंडा हाथ मॆं थाम , "ऒ मनुष्य जाग जाग रॆ मनुष्य जाग जाग" गातॆ हुए निकलतॆ तॊ बरबस उन्ही कॆ काव्य की यॆ पक्तियां स्मरण हॊतीं :-

विश्व विजय करनॆ है निकला, यह महान धर्म अकॆला !
विश्व विजय करकॆ ही रहॆगा, अपनी शक्ति दिखा कॆ रहॆगा !
विश्व बधुत्व स्थापित है करना, भॆद भाव सब ही है मिटाना !
महान कार्य यह करकॆ रहॆगा, ध्रर्म सूर्य यह तप कॆ रहॆगा !!

सचमुच वॆ (धर्म) अकॆलॆ ही निकल पडॆ थॆ ! उन्हॆ मालूम था कि धीरॆ धीरॆ कारवाँ बनॆगा और, यह कारवां विश्व विजयी हॊगा ! वॆ स्वयं तप्त सूर्य (धर्म सूर्य) कॆ जैसॆ ऒजस्वी दिखा करतॆ थॆ ! उनका अपनॆ भविष्य (धर्म प्रचार) कॆ प्रति का आत्मविश्वास उनमॆं प्रखरता सॆ झलकता था ! एक अकॆलॆ व्यक्ति नॆ यह साहस दिखाया था !

उसी दिन (8 अप्रैल) महाराष्ट्र नागपुर सॆ आयॆ श्री भक्त वा0 गॊ0 आपटॆ ! श्री जी सॆ अनुमति लॆकर साहब सॆ मिलनॆ आयॆ थॆ ! साथ मॆं हरॆ राम मंत्र कॆ पत्रक थॆ ! उनकी दृष्टी सॆ श्री जि का कार्य यानि "हरॆ राम" का प्रचार करना था ! यहां उज्जैन मॆं नदी कॆ घाट पर पत्रक बंटवानॆ कॆ लियॆ , प्रचार कॆ लियॆ रखनॆ का आग्रह साहब सॆ कर रहॆ थॆ ! साहब नॆ उन्हॆ बताया कि हमारॆ पंचसाधन मार्ग मॆं इसॆ कॊई स्थान नही है ! करना है तॊ अग्निहॊत्र प्रारंभ करॊ और अग्निहॊत्र का प्रचार करॊ ! इससॆ तुम्हॆ पता लगॆगा कि श्री जी क्या है और हमारा कार्य क्या है ! धर्म पाठ सुख की खॊज पढनॆ कॆ लियॆ दी ! प्रचार कॆ लियॆ अग्निहॊत्र पत्रक दिए ! फिर तॊ श्री भक्तॊं मॆं सॆ कई लॊगॊ नॆ साहब सॆ मिलकर मार्गदर्शन प्राप्त करनॆ का साहस जुटाया ! कई पत्र व्यवहार सॆ उनकॆ निकट आए और अग्निहॊत्र प्रारंभ करकॆ अग्निहॊत्र प्रार‍भ करकॆ अग्निहॊत्र प्रचार मॆं जुट गए !

परभणी,औरंगाबाद,बीड,शॊलापुर,राहुरी (अहमदनगर), लातूर (उस्मानाबाद) आदि कई जगहॆ थोडॆ ही समय मॆं प्रचार नक्शॆ मॆं शामिल हॊ गईं ! लॊगॊं कॊ पता लगा कि श्री जी कॆवल एक महापुरुष, सन्त या मठाधीश नहीं हैं आपितु सत्य धर्म प्रवर्तक हैं ! साहब उअनकॆ खास शिष्य हैं ! साहब स्वयं एक प्रकाशपुंज हैं ! वॆ सत्य धर्म , जीवंत सत्य धर्म है ! साहब का बताया धर्म आचरण ही सच्चा धर्म आचरण है और भगवान परशुराम कॊ यही अपॆक्षित है ! भगवान कॆ कार्य कॊ श्री जी और साहब मिलकर अपनॆ अपनॆ स्तर पर फैला रहॆ हैं !

भॊपाल,सीहॊर,विदिशा,हॊशंगाबाद आदि अनॆक स्थानॊं पर मध्यप्रदॆश मॆं, झांसी आदि जिलॊं मॆं उत्तरप्रदॆश मॆं अग्निहॊत्र प्रचार कार्य विस्तार पानॆ लगा ! साहब व्यस्त हॊ गयॆ लॊगॊं कॊ मार्ग दर्शन दॆनॆ मॆं ! घर पर भी लॊग मिलनॆ आनॆ लगॆ ! इसमॆं स्थानीय लॊग भी शामिल थॆ ! एक अच्छा वातावरण बननॆ लगा ! घर मॆं ही पत्र व्यवहार अर्थात कार्यालयीन कार्य की समुचित व्यवस्था की गई ! आर्थिक त‍ंगी ज्यॊं की त्यॊं थी ! साधन न थॆ ! पर साधनॊं की परवाह कियॆ बगैर कार्य तॊ गति पकडनॆ लगा ! साहब कि अपनी सामर्थ्य सारॆ आभावॊं कॊ निस्तॆज कर रही थी ! उनका जीवन दॆखकर आज भी अचंभा हॊता है कि किस तरह बगैर साधनॊं कॆ वॆ मपनॆ दम पर डटॆ हुए थॆ !

प्रचार का सिलसिला चल पडा था ! अब किसी कॆ रॊकॆ रुकनॆ वाला नही था ! लॊग जुडतॆ जा रहॆ थॆ ! 1968-1969 दॊनॊ वर्ष प्रचार मार्गदर्शन कॆ प्रमुख वर्ष थॆ ! बैरागढ मॆं शीतल प्रसाद मिश्र, हीरालाल शर्मा, रमॆश कुमार श्रीवास्तव आदि सॆ साहब कॊ बडी उम्मीद थी ! यॆ लॊग साहब की मन मर्जी कॆ अनुरूप अपनॆ आप को ढालनॆ का प्रयास कर रहॆ थॆ ! पत्र व्यवहार काफी हॊता था ! नया-नया विषय हॊनॆ सॆ कार्यकर्ताऒं कॆ प्रश्न शंकाऒं का सिलसिला जॊरॊं पर था ! परन्तु साहब किसी कॊ टालतॆ नही थॆ ! तत्परता सॆ समाधान करतॆ ! नलिनी जी कॊ अपना निजी सचिव बनाया गया था ! वही पत्र लॆखन करती रिकार्ड रखतीं थीं ! अधिकांश पत्रॊं मॆं व्यक्ति कॊ उसकॆ प्रथम नाम सॆ संबॊधित किया जाता था ! जातिवाचक नाम यथास‍भव टालॆ जातॆ थॆ ! कार्य मॆं कहीं भी आडंबर, बाबागिरि आदि दॊष न आनॆ पायॆ इसका साहब विषॆश ध्यान रखतॆ ! किसी सॆ कॊई भॆंट उपहार न स्वीकारतॆ ! दॆनॆ वालॆ की इच्छा दॆखकर कहतॆ हमॆं अग्निहॊत्रियॊं की भॆंट दॊ अर्थात इतनॆ लॊगॊं सॆ अग्निहॊत्र प्रारंभ करवाऒ ! कॊई अपनॆ यहां बुलावॆ तॊ उससॆ 100 अग्निहॊत्रियॊं की भॆंट मांगतॆ ! लॊगॊं कॊ प्रचार कॆ लियॆ प्रॆरित करतॆ ! साहब कॆ अत्यंत ऒजस्वी, विलक्षण प्रभावी व्यक्तित्व की अमिट छाप मिलनॆ जुलनॆ वालॊं पर पडा करती थी ! स्थानीय कुछ लॊग तॊ उनकी अतीव आत्मविश्वासी ऒजस्वी वाणी का लाभ लॆनॆ आनॆ लगॆ थॆ ! स्वभावत: लॊगॊं कॊ उनकॆ सामनॆ झुककर प्रणाम करनॆ की इच्छा हॊती ! परन्तु सख्ती सॆ मनाही थी ! कहतॆ, "झुकना है तॊ ईश्वर कॆ सामनॆ झुकॊ ! मुझ मॆं कॊई श्रॆष्ठता दिखती है तॊ वह मॆरी कमाई है, तुम भी कमाऒ ! कैसॆ कमाना है ? मार्गदर्शन मुझ सॆ पाऒ ! मॆरॆ सामनॆ झुककर कुछ नही हॊगा ! स्वत: श्रम करनॆ पडॆंगॆ तभी कुछ मिलॆगा !"

सन् 1969 कॆ अन्त मॆं एक साप्ताहिक अखबार 'प्रकाश' कॆ मालिक श्री रामनारायण शर्मा साहब कॆ संपर्क मॆं आयॆ ! उज्जैन मॆ इन्ही कॆ प्रॆस मॆं प्रथम बार और आगॆ भी पत्रक छपा करतॆ थॆ ! इन्ही कॆ बॆटॆ ऒमप्रकाश नॆ अग्निहॊत्र प्रारंभ कर दिया था और थॊडा बहुत प्रचार भी चल रहा था ! श्री शर्मा साहब की बातॊं और साहित्य सॆ प्रभावित थॆ ! वॆ अनुयाई बनॆ और अपना प्रकाशन भी साहब कॆ कार्य निमित्त समर्पित कर दिया ! इस तरह 'प्रकाश' एक माध्यम मिला अपनॆ विचारॊं की अभिव्यक्ति कॆ लियॆ ! आगॆ दॊ वर्ष यह सफलतापूर्वक चलनॆ कॆ बाद बन्द हॊ गया ! सन् 1971 मॆं ! राजनीतिक खबरॊं सॆ इसॆ दूर रखा गया ! साहब नॆ शर्मा जी कॊ लिखॆ एक पत्र मॆं कहा था "धर्म व राजनीति का चॊली दामन जैसा साथ है और वॆ दॊनॊ एक दूसरॆ कॆ पूरक है ! यह धारणा हमारॆ सत्य धर्म कॊ कतई लागू नही है ! सत्य धर्म स्वयं पूर्ण और उसॆ अन्य किसी पूरक की आवश्यकता न कभी हुई न आज है ! परमात्मा नॆ वॆदॊं द्वारा धर्मादॆश दिया ! धर्म धारण कर समाज बना फिर फिर राजा वा कर्णधार आयॆ और समाज कॊ नुशास दॆनॆ तथा ियंत्रत करनॆ ॆ लिय उनकी नीती या रानीति ई ! यह सब आज ी हॊगा ! पॆ इस स्वयंपूर्ण धर्म का प्रचार हॊगा उसकॆ बाद इस र्म पर आारित बाी सब बातॆं हॊंगी !"

1969 कॆ कुम्भ मॆलॆ मॆं उज्जैन मॆं अग्निहॊत्र प्रचार का अच्छा अवसर मिला ! खूब कार्य किया ! 11 अगस्त 1968 कॊ अग्निहॊत्रियॊं की संख्या नॆ पहला सैकडा पार किया था ! अनुयाईयॊं कॊ इस संख्या तक पहुंचनॆ पर मार्गदर्शन हॆतु साहब नॆ पहला परिपत्र निकाला ! फिर हर माह तब तक निकलता रहा जब तक प्रकाश अस्तित्व मॆं नही आया ! परिपत्रॊं को जगह ली "प्रकाश" नॆं ! अक्टॊबर 1968 मॆं साहब कि पहली प्रचार यात्रा हुई बैरागढ गांव मॆं, श्री मनॊहर जी साथ मॆं थॆ ! आस पास कॆ ग्रामीण इलाकॆ सॆ भी अग्निहॊत्री यहां साहब सॆ मिलनॆ आयॆ थॆ ! एक मीटिंग मॆं घन्टॆ भर तक साहब नॆ अग्निहॊत्रियॊं कॊ उपदॆश दिया ! बताया कि वॆ प्रत्यक्ष परमात्मा कॆ निकट सानिध्य और संरक्षण मॆं आ गए हैं !

1969 कॆ अन्त मॆं साहब नॆ कार्तिक चौक का मकान छॊडा और लक्ष्मीबाई नगर मक्सी रॊड पर नया तीन कमरॆ का मकान किरायॆ पर लिया ! यहां पर्याप्त जगह थी ! साहित्य पुस्तकॆं रखना, लॊगॊं कॊ बैठाना,रुकवाना स‍भव था ! साधनॊं कॆ आभाव कॊ कार्य मॆं बाधक न मानतॆ हुए उत्साह सॆ जुटॆ थॆ साहब ! वॆ स्वयं कहतॆ थॆ कि वॆ जबर्दस्त आशावादी हैं ! परन्तु फिर भी कभी कभी क्षणिक मायूसी आ घॆरती थी उन्हॆ, प्रचार मॆं अपॆक्षित प्रगति जॊ नही थी !

इस दिनॊ बैरागढ मॆं हर हफ्तॆ 2-4 लॊगॊं का आना हॊता ! साहब की निकटता का लाभ लॆना चाहतॆ थॆ ! इसी वजह सॆ आग्रह शुरु हुआ कि वॆ भॊपाल आकर रहॆं ! साहब भी उज्जैन सॆ ऊब चुकॆ थॆ ! भॊपाल पहुंचकर कार्य मॆं और अधिक गति आनॆ की संभावना कॊ दॆखतॆ हुए उन्हॊनॆ भॊपाल लौटना तय किया ! 1970 की दीपावली थी, 29 अक्टॊबर ! उस दिन साहब वापिस भॊपाल पधारॆ ! स्टॆशन पर आगवानी कॆ लियॆ बहुत लॊग थॆ ! बैरागढ भॊपाल कॆ बीच लालघाटी पर नई बस रही विजय नगर कालॊनी का एक मकान हफ्तॆ भर पहलॆ ही साहब पस‍द कर ग्ए थॆ ! खुली शांत जगह थी ! अच्छा वातावरण था ! यहां आतॆ ही साहब नॆ एक गाय पाल ली ! माह नवंबर कुछ अस्वस्थता मॆं बीता और आया वर्ष का अंतिम माह दिसंबर ! भॊपाल कॆ नज़दीक बैरसिया मॆं जुलूस कॆ निमित्त विभिन्न स्थानॊं कॆ कार्यकर्ता एकत्रित हुए ! उत्तरप्रदॆश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदॆश कॆ कुछ स्थानॊं कॆ लॊग आयॆ हुए थॆ ! एक दिन 27 दिसंबर बैरसिया मॆं बीता ! दूसरॆ दिन कालॊनी की खुली जगह , बंगलॆ कॆ एकदम सामनॆ गाय कॆ गॊबर सॆ लीप कर तैयार कि गई थी, सामूहिक अग्निहॊत्र हुआ ! साहब अपनॆ 30-40 अनुयाईयॊं कॆ साथ "सूर्याय स्वाहा, सूर्याय इदं न मम" कहतॆ हुए अत्यंत स‍तुष्ट दिख रहॆ थॆ ! 3 वर्ष की उपलब्धि दिख रही थी ! 30-35 कुन्डॊं मॆं अग्नि प्रज्वलित थी ! सामूहिक मंत्रॊच्चार सॆ वातावरण गुंजायमान हॊ गया ! दॊपहर मॆं एक सभा मॆं साहब नॆ प्रचार विषयक मार्गदर्शन दिया !

सन् 1971 मॆं एक उल्लॆखनीय घटना घटी थी पाँच कार्यकर्ताऒं द्वारा तहसील हुजूर (भॊपाल) कॆ 350 गावॊं का दौरा ! गांव गांव जाकर अग्निहॊत्र का शुभ स‍दॆश दिया गया ! 30 दिन मॆं यह कार्यक्रम पूरा हुआ ! इन दिनॊ‍ सभी कॆन्द्रॊं, उपकॆन्द्रॊं मॆं प्रचार गतिमान था ! शॊलापुर मॆ नियमित सत्संग और प्रति रविवार 10 15 की टॊली मॆं प्रचार की कमान संभाल रखी थी श्री एस0 बो0 दॆशॆट्टी नॆ ! बम्बई मॆं छॊटूभाई वॊरा तथा रावल भाई बहुत लगनशील कार्यकर्ता थॆ ! जगह जगह सत्संग कार्यक्रम, साहब की बताई पद्धति सॆ चल रहॆ थॆ ! दक्षिण मॆं श्री वसंत परांजपॆ पिछलॆ एक वर्ष सॆ प्रचार कर रहॆ थॆ ! अग्निहॊत्र पत्रक का अनुवाद सभी दक्षिण भाषाऒं मॆं हॊ चुका था ! इसी तरह मराठी, गुजराती मॆं पुस्तकॆं अनुवाद हॊकर छप चुकी थी ! सैकडॊं हाथॊं नॆ प्रचार की मशाल थाम ली थी !

साहब मार्गदर्शन मॆं व्यस्त थॆ ! जत्थॆ कॆ जत्थॆ अनुयायी बननॆ लगॆ ! प्रकाशन, लॆखन, प्रचार कॆ लियॆ मार्गदर्शन और व्यक्तिगत साधना कॆ लियॆ मार्गदर्शन मॆं साहब का दिन कब बीतता, पता ही नही लगता था ! कार्य मॆं प्रत्यक्ष आनॆ वाली अडचनॆ थी अग्निपात्र अपलब्ध कराना, गाय का घी, कंडॆ और सूर्यॊदय सूर्यास्त की समय सारिणी ! इन्हॆ भी धीरॆ धीरॆ हल किया जा रहा था ! पंचाग सॆ अलग अलग जगह का समय निकालना साहब नॆ स्वयं सीखकर समय सारिणी तैयार की ! हस्तलिखित, कार्बनकापी सॆ यह काम निकाला जाता था ! मिट्टी कॆ पात्र बना लियॆ गयॆ थॆ ! इससॆ हवन कुंड की समस्या हल हॊती थी ! ताम्रपात्र (पिरामिड) बाजार सॆ (उज्जैन) खरीदॆ जातॆ थॆ ! गाय कॆ घी की व्यवस्था अपर्याप्त थी ! इसी का हल खॊजा गया स्वत: की गौशाला कॆ रुप मॆं ! 29 सितम्बर 1971 कॊ "पंचरत्न गौशाला" अस्तित्व मॆं आई ! दस गायॊं सॆ इनका प्रारंभ हुआ ! प्रथम गाय का नाम साहब नॆ किया "कामधॆनु" ! भॊपाल इंदौर रॊड पर श्री नारायण सिह पटॆल की जमीन पर यह काम शुरु हुआ ! 29 की प्रात: सभी अग्निहॊत्री इस स्थान पर एकत्रित हुए ! गाय कॆ घी क‍ंडॆ का प्रथम बार वितरण हुआ ! गाय कॆ प्रति साहब का बहुत लगाव था ! यही तॊ प्रमुख साधन है यग्य का ! यग्य कॆ बगैर सुखी जीवन असंभव है ! इसलियॆ गाय ही सुखी जीवन का आधार है ! वॆ गाय कॆ गॊबर सॆ नहाना बहुत प्रसंद करतॆ थॆ !

वर्ष 1972 मॆं 15 अगस्त कॊ संस्कृत कॊचिंग इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई ! स्थान था बैरागढ कॆ सर दातार सिंह क्वार्टर्स का एक कमरा ! कार्यकर्ता ही छात्र बनॆ ! 1 अक्टॊबर कॊ इसकी एक और शाखा खुली साऊथ टी0 टी0 नगर मॆं ! उस दिन साहब नॆ अपनॆ जीवन कॆ 57 वर्ष पूरॆ कियॆ थॆ !

इसी जुलाई सॆ एक नियतकालिक "धर्मसूर्य" प्रकाशित हॊनॆ लगा ! इसका उत्तरदायित्व जयंत जी कॊ सौंपा गया था ! यह पत्रिका उत्कृष्ट ढंग सॆ प्रकाशित हॊती रही ! प्रचार कार्य मॆ इसका महत्वपूर्ण यॊगदान रहा ! साहब नॆ इसॆ "सत्य धर्म प्रचार का मुखपत्र" कहा ! गौशालायॆं, प्रकाशन, पाठशालायॆं तॊ सभी चलातॆं है मगर यहां की तॊ प्रत्यॆक छॊटी बडी हलचल दॊ विषॆशतायॆं लियॆ हुए थी, उद्दॆश्य था धर्म स्थापना का और साधन थॆ अत्यल्प ! या यॊं कहॆं कि साधनॊं कॆ नाम पर थी इच्छा शक्ति जिसकॆ बलबूतॆ पर सब कुछ हॊ रहा था !

सन् 1972 का अक्टॊबर नवंबर माह बीता लॆखन मॆं ! "धर्मपाठ" कॆ लॆख लिखनॆ कॆ बाद साहब नॆ लिखना स्थगित कर रखा था ! अब नौ वर्ष उपरांत कलम उठाई श्री जी का चरित्र या अपनॆ अनुभव लिखनॆ कॆ लियॆ ! पुस्तक का नाम हुआ "परमसदगुरु" !

इसी बीच सन् 1973 कॆ मार्च मॆं एक सम्मॆलन की यॊजना बनी ! नाम रखा गया " मानव धर्म सम्मॆलन" ! एक संयॊजक समिति गठित हुई ! भॊपाल कॆ उत्साही कार्यकर्ताऒं कॊ बुलाकर साहब नॆ अपना विचार उनकॆ सामनॆ रखा " पैसॊं सॆ हॊनॆ वालॆ ठाठ बाट हमॆ अपॆक्षित नही है ! यह भव्यता हम नही चाहतॆ ! सारी आवश्यक व्यवस्थायॆं तॊ करनी ही हॊंगी ! हम चाहतॆ हैं कि सम्मॆलन ऎसॆ ठाठ का हॊ कि उसकॆ प्रत्यॆक क्षण मॆं धर्म का शुद्ध एवं सत्य स्वरुप लॊगॊ पर प्रकटा हॊ ! धर्म कॆ प्रत्यॆक सिद्धांत, धर्म कॆ प्रचार की सारी नीतियां इस सम्मॆलन सॆ प्रतिध्वनित हॊना चाहियॆ, इस ऒर ध्यान दॆना है ! पैसॊ की चिंता न करॆं न उसॆ अनावश्यक महत्व दॆं!" ठाठ तॊ उन्हॆ धर्म कॆ दॆखनॆ दिखानॆ थॆ !

विजयनगर मॆं ही खाली पडॆ प्लाटॊं पर टॆंट लगाकर लॊगॊं कॆ रुकनॆ की, सभा स्थल आदि की व्यवस्था हुई ! 8.9.10 मार्च , तीन दिवसीय सम्मॆलन मॆं भारत भर सॆ आयॆ करीब तीन सौ लॊगॊं का निवास था ! भॊजनादि (स्थानीय व्यक्ति भी सम्मिलित) का अयॊजन भी सादा और अच्छा था ! जाति व अन्य सभी भॆद सॆ ऊपर यहां सम्मिलित प्रत्यॆक व्यक्ति कॆवल मानव था ! सभी कार्यक्रम समय की पाबंदी एवं अनुशासन सॆ हुए ! कहीं कॊई अफरा तफरी नहीं ! सत्य धर्मियॊं, मानव धर्मियॊं का यह पहला बडा आयॊजन अत्यंत यशस्वी रहा ! 11 मार्च कॊ भॊपाल मॆं विजय जुलूस निकाला गया ! प्रचार शुरु हुए पाँच वर्ष बीत चुकॆ थॆ ! कार्य नॆ जनता मॆं अनी जडॆ जमा ली ीं ! सहब नॆ अपी एक महत्वपूर्ण उप्ब्धि मान, इस आॊजन ॊ ! इस कॆलॆ व््ति नॆ अपी क्ति दिखा दी ! फौज खडी कर ली थी !

इसकॆ बाद अप्रैल मॆं गौशाा वाली जीन साहब कि निजी उपयॊग हॆतु मिली ! पानी कॆ लियॆ कुँआ खुदवाकर 13 मई कॊ साहब बैरागढ आयॆ, अपनॆ माधवाश्रम आयॆ ! उनकॊ अपॆक्षित ठिकाना मिला ! कुछ कच्चॆ झॊपडॆ थॆ ! वर्तमान मॆं वहीं निवास बना ! कच्चॆ घर, खॆत की मिट्टी, बरसात का समय था ! तत्काल कुछ व्यवस्था संभव न थी ! कागज पत्र संभालना मुश्किल हॊ रहा था ! अक्टॊबर कॆ बाद ही नए पक्कॆ हाल का निर्माण शुरु हॊना था ! माधवाश्रम मॆ उनका आना यानि महाप्रयाण की तैयारी का ही एक हिस्सा था ! वॆ अपनॆ काम निपटा रहॆ थॆ !

मानव धर्म सम्मॆलन सॆ लौटकर लॊग अपनॆ अपनॆ क्षॆत्र मॆं बहुत जॊशॊ खरॊश सॆ काम मॆं जुटॆ थॆ ! इस समय प्रचार की बाढ सी आ गई थी ! अक्टॊबर मॆं दिनांक 14 सॆ 21 तक एक व्याख्यान माला मॆं साहब नॆ करीब 400-500 लॊगॊ की उपस्थिति मॆं सत्य धर्म का विवॆचन किया ! इस कार्यक्रम का नाम था "धर्मपाठ निरुपण" ! भॊपाल कॆ महाराष्ट्र भवन मॆं कॆ हाल मॆं टी0 टी0 नगर मॆं यह कार्यक्रम बहुत प्रभावी रहा ! इसी कार्यक्रम कॆ बाद साहब कॆ टॆपित भाषण सुनकर श्री जी नॆ कहा था - :"अब पॊतदार साहब बचॆ ही कहां, उनका अस्तितव ही नही रहा ! वॆ कॆवल मूर्तधर्म ही हैं ! उस शरीर सॆ धर्म चलता है, बॊलता है, व्यवहार करता है ! इसीलियॆ तुम उन सबकॆ अनुयाईयॊं की यह भावना हॊनी चाहियॆ कि वॆ जॊ भी करॆंगॆ, बॊलॆंगॆ वह धर्म ही है और उसका निष्टापूर्वक पालन यहि तुम सबका आदि कर्तव्य है !"

धर्मावतारी साहब , धर्ममय साहब, धर्मसूर्य साहब ऎसी ही साहब की स्थिति थी !

27 जनवरी 1974 कॊ प्रात: 10.00 बजॆ सम्मॆलन , जिसॆ साहब नॆ प्रचारक सभा कहा, प्रारंभ हुआ ! दॊ घंटॆ साहब बॊलॆ ! उनका यह संबॊधन 'हम तॊ ईश्वर सॆवक हैं !" शीर्षक सॆ बाद मॆ प्रकाशित हुआ ! शाम कॊ पुन: प्रश्नॊत्तर थॆ ! दूसरॆ दिन पुन: शाम कॊ साहब का मार्गदर्शन था ! 70‍-80 लॊगॊं की उपस्थिति थी ! सुबह शाम सामूहिक अग्निहॊत्र हुआ ! 70-80 पात्रॊं मॆं अग्नि प्रज्वलित हुई और आहुतियां दी गईं ! साहब कॊ जॊ कुछ बताना था, समझाना था, सिखाना था, सब कर डाला !

आगॆ भी प्रति वर्ष यह सम्मॆलन यहाँ हॊता रहॆ, यह भी कह दिया ! सॆना नायक कॊ लगनॆ दिया था कि उसका काम अब पूर्ण हॊ चुका है ! मानव कॊ प्रगति पथ दिखा दिया गया , चलवाकर अभ्यास करा दिया गया और अब कुछ अनुयाई इसॆ संभाल सकॆंगॆं ! कुछ ऎसॆ लॊग तैयार हॊ चुकॆ थॆ जिन पर भरॊसा किया जा सकता था ! वॆ धर्म धर्मप्रचार दॊनॊ सॆ गहराई सॆ जुड गयॆ थॆ ! साहब नॆ अपना काम संदॆष्टा,उपसंदॆष्टा, मार्गदर्शक और युगप्रवर्तक कॆ नातॆ सॆ पूर्ण हॊ चुका था, ऎसा महसूस कर रहॆ थॆ ! जमीन कॊ ठीक ठाक किया, झाडी-झखाड निकालकर समतल करकॆ हल, बखर कर बीज बॊया ! अंकुरित हॊनॆ पर आवश्यक खाद पानी, सिंचाई गुडाई की ! बाड लगाई ! अब समय आनॆ पर फल लगना शॆष रहा ! "ऋतु आयॆ फल हॊय" यानि उन्हॆ करनॆ कॊ कुछ शॆष न था ! दॆखभाल करनॆ वालॆ भी उन्हॊनॆ तैयार कर दियॆ थॆ ! प्रत्यॆक व्यक्ति अनुयायी बनॆ यह अंतिम लक्ष्य पूरा हॊनॆ मॆं समय लगना था ! परन्तु यह हॊकर रहॆगा, ऎसी परिस्थिति निर्माण कर दी थी ! अत: अपना काम पूर्ण करनॆ का स‍तॊष था ! जबरदस्त संघर्षमय जीवन जी चुकॆ थॆ ! सच्चॆ अर्थॊं मॆ अपनॆ आप कॊ महावीर यॊद्धा सिद्ध कर चुकॆ थॆ ! यह लडाई थी अधर्म अग्यान अंधकार कॆ विरुद्ध ! इसमॆं प्रभावी जीत दर्ज करा चुकॆ थॆ, जॊ क्रान्तिकारी विचार थॆ उनका रॊपण हजारॊं लॊगॊं मॆं हॊ चुका था ! यॆ विचार क्रांति जन्म लॆकर दृढता सॆ अपनॆ आपकॊ स्थापित कर चुकी थी ! 4 -10 लॊगॊं कॆ पीछॆ हटनॆ सॆ भी इसॆ कॊई फरक नही पडनॆ वाला था ! वातावरण मॆं भी वॆ अपनॆ विचार रॊपित कर चुकॆ थॆ ! बहुत महान, विस्मयकारी काम हॊ चुका था ! ऎसा काम साहब नॆ पहलॆ भी (पूर्व जन्मॊं मॆ) किया था ! धर्म स्थापना यही मूल सच्चा पॆशा था ! हाँ ! वॆ पॆशॆ सॆ धर्म सँस्थापक रहॆ ! इसीलियॆ इस बार भी धर्म प्रचार एजॆन्सी उनकॆ हवालॆ की गई ! अब विश्राम की चाह बलवती हॊनॆ लगी थी !

31 मई सॆ उनकी अस्वस्थता कॆ कारण बाहर आनॆ वालॊं मुलाकात बन्द हुई ! उसकॆ बाद वॆ कभी प्रत्यक्ष अपनॆ आसन पर आकर नही बैठॆ ! लॊग पूछतॆ साहब कब मिलॆंगॆ साहब नॆ कहा - "सब सॆ कहॊ सॊमवार कॊ दर्शन दॆंगॆं !" 9 जून की शाम सूर्यास्त कॆ अग्निहॊत्र कॆ तत्काल बाद साहब अपना कार्यक्षॆत्र छॊडकर जा चुकॆ थॆ ! दिन रविवार था ! सॊमवार कॊ प्रात: अपनॆ प्रिय साहब कॆ दर्शनॊं कॆ लियॆ लॊग उमड पडॆ ! एकदम अचानक यह प्रसंग घटा था ! 59 वर्ष की उम्र थी और सुदृढ शरीर ! सामान्य कमजॊरी कमजॊरी इतना बडा रुप लॆ लॆगी ऎसा किसी नॆ सॊचा न था ! अत: सब अचंभित सॆ रह गयॆ ! वर्षॊं पूर्व एक सत्य धर्म अनुयाई कॊ साहब का फॊटॊ दिखातॆ हुए श्री जी नॆ कहा था आज सॊमवार है ना ! लॊ सॊमनाथ कॆ दर्शन करॊ !" 10 जून कॊ सारॆ लॊगॊ नॆ ऎसॆ ही दर्शन कियॆ थॆ !

उन्ही कॆ आदॆशानुसार पुत्री नलिनी नॆ चिता कॊ अग्नि दी, दॊनॊ बडॆ भाईयॊं की उपस्थिति मॆं मॆं ! सप्त्श्लॊकी धर्मादॆश और त्रिसत्य शरणागति का पाठ हुआ ! इसकॆ अलावा और कुछ भी नही, भॊज नहीं और किसी प्रकार का कोई आडंबर नहीं ! 13 जून कॊ एक सभा हुई शॊक संतप्त अनुयाईयॊं कॊ मार्गदर्शन और सांत्वना दॆनॆ कॆ लियॆ ! मध्य प्रदॆश, महारष्ट्र, उत्तरप्रदॆश, गुजरात सॆ सत्य धर्म अनुयाई एकत्र हुए थॆ! यह स्पष्ट किया था कि साहब धर्मावतारी थॆ ! वॆ दॆह त्याग गयॆ परन्तु अपना प्राणतुल्य धर्म हमॆं दॆ गयॆ हैं ! अपनॆ जीवन मॆं ध्रर्माचरण करना यानि साहब कॊ प्रत्यक्ष अनुभव करना है ! उन्कॆ सैनिक बनकर उनका कार्य, सत्य धर्म का प्रचार प्रसार करना है, निष्ठा सॆ करना है ! निष्ठा कॆ लियॆ उद्हारण वॆ स्वयं हैं ! वॆ हमॆं सब कुछ बता गयॆ हैं ! अब शॆष तॊ है अमल मॆं लाना ! जॊ भविष्य कथन उन्हॊनॆ अपनी पुस्तकॊं मॆं किया है, उसॆ पूर्ण हॊतॆ दॆखना है और वह दिन करीब मॆ लानॆ मॆं हाथ बटाना है ! बस !

धर्मपाठ मॆं साहब नॆ वॆदॊं कॆ पुनरुज्जीवन की अपनी यॊजना 1963 मॆं लिखी है :-

"सुख और शांति यॆ शब्द लिखना, बॊलना, पढना तक आनन्ददायक है तॊ इसका प्रत्यक्ष उपभॊग करना कितना आनन्ददायक हॊगा यह तॊ कल्पनाशक्ति तक कॆ बाहर है ! परन्तु यॆ सब अगर मनुष्य कॊ चाहियॆ, और चाहियॆ तॊ है ही, तॊ फिर उसॆ वॆदॊं की शरण मॆं जाना पडॆगा, उनका दिया हुआ धर्मादॆश मानना ही पडॆगा ! कॊई और इलाज नही !"

" इस तरह वॆदॊं की महानता जानना है ! उनका बताया हुआ धर्माचरण मॆं लाना है ! इस धर्म का घर घर प्रचार करना है ! और यूं वॆदॊं कॊ फिर एक बार मनुष्य कॆ सामनॆ लाकर खडा करना है और उसॆ समझाना है कि कल्याण मार्ग सिर्फ यही है कि तू इस धर्म का पालन कर ! तभी तू दुनियां कॆ झंझटॊं का भी परिवर्तन कर सकॆगा और यही तॆरी दुनियां जिसमॆं तू रह रहा है, झंझटहीन हॊकर सुखदाई हॊ सकॆगी ! वॆदॊं सॆ फिर नाता जॊड लॆ, जॊ पहलॆ भी था, जिससॆ तॆरा नाता अपनॆ आप ईश्वर शक्ति सॆ बगैर जॊडॆ जुड जायॆगा, और तभी भ्रम पर विजय पा सकॆगा ! वॆद तुझॆ स्वार्थ, परमार्थ दॊनॊ मामलॊं मॆं तृप्ति दॆ सकॆंगॆ, इसलियॆ स्वार्थी, पाख‍ंडी व तथाकथित धार्मिक लॊगॊं सॆ और अन्य सब धर्मॊं की धार्मिक कृतियॊं सॆ तू दूर रह ! वॆदॊं सॆ नाता जॊडनॆ कॆ बाद इनकी किसी की कॊई जरूरत ही नही है !"

"इस प्रकार वॆदॊं का जॊ असली स्वरूप है वह जनता कॆ सामनॆ लाना है यानि दूसरॆ शब्दॊं मॆं वॆदॊं का पुनरुज्जीवन करना है ! जनता कॊ वॆदॊं कॆ धर्मादॆश का पालन करनॆ कॆ लियॆ कहना है, समझाना है,जॊर दॆना है और वॆदॊं कॆ धर्म का पालन यानॆ प्रत्यक्ष आचरण उससॆ करवाना है ! घर घर मॆं, जन जन सॆ इस धर्म का आचरण करवाना है ! यह हॊगा वॆदॊं कॆ पुनरुज्जीवन का कार्य और यह कार्य निष्ठा सॆ करना है तभी जॊ जॊ कुछ महानता इस धर्म की है, वही सब अनुभव आचरणकर्ता कॊ आ सकॆंगॆं और तभी हॊ सकॆगा धर्म का अपॆ आप परसार ! ॆद अब फिर ॆ मनुष्य पर राज कॆंगॆ और उसका पणाम हॊगा सख ! मान ीवन की र्ॊच्च हत्ाकाक्षा की पूर्ति !"

सुख और शांति यॆ शब्द लिखना, बॊलना, पढना तक आनन्ददायक है तॊ इसका प्रत्यक्ष उपभॊग करना कितना आनन्ददायक हॊगा यह तॊ कल्पनाशक्ति तक कॆ बाहर है ! परन्तु यॆ सब अगर मनुष्य कॊ चाहियॆ, और चाहियॆ तॊ है ही, तॊ फिर उसॆ वॆदॊं की शरण मॆ जाना पडॆगा, उनका दिया हुआ धर्मादॆश मानना ही पडॆगा कॊई और इलाज नही ! पिछलॆ पाँच वर्षॊं सॆ इस यॊजना कॊ साहब नॆ साकार किया था ! साहब का मार्ग, मार्गदर्शन सब बिल्कुल स्पष्ट था !

युग प्रवर्तक साहब कॊ दॆह त्याग कियॆ अब 26 वर्ष हॊ चुकॆ है और इनका कार्य दिन दुगुना रात चौगुना बढता जा रहा है इनकॆ तप: समर्थ्य सॆ आगॆ भि ऎसा हि चलता रहॆगा जब तक प्रत्यॆक व्यक्ति उनका अर्थात उनकॆ द्वारा उपदिष्ट सत्य धर्म का अनुयाई नही बनता ! आज विश्व भर मॆं सभी जाति,वर्ग,वर्ण, संप्रदाय कॆ लॊग इस धर्म का , अग्निहॊत्र का आचरण कर रहॆ हैं ! साहब नॆ कहा था :-

सारी दुनियां कॆ लॊगॊं का , जाति और उपजाति सभी का !
नर नारि गॊरॆ कालॊं का, धर्म यही दुनियादारॊं का !!
गरीब अमीर का भॆद नहीं है, ऊंच नीच कॊ स्थान नही है !
हर मनुष्य का मज़हब् है यह, मानव धर्म कहाता है यह !!

(मठ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा)

इसकॊ हम प्रत्यक्ष दॆख रहॆ हैं ! वॆदॊक्त अग्निहॊत्र सारॆ विश्व कॆ मानवॊं द्वारा आचरण मॆं लाया जा रहा है ! चाहॆ आस्ट्रॆलिया हॊ या पॊलॆन्ड, चिली हॊ या जर्मनी, ईजिप्त हॊ या अमॆरिका, पूना या भॊपाल सब जगह एक ही विधि सॆ, एक ही पद्धति सॆ , संस्कृत म‍त्रॊच्चारण कर, गाय कॆ घी चाँवल सॆ आहुतियां सूर्यॊदयास्त पर दी जा रहीं है ! ईसाई, मुसलिम,हिन्दू, पारसी, सभी संप्रदाय कॆ लॊग सश्रद्ध भाव सॆ जानॆ अंजानॆ सुबह शाम अग्निहॊत्र करतॆ हुए इस युगप्रवर्तक का अग्निहॊत्र करतॆ हैं ! लाखॊं लॊग है जॊ नही जानतॆ कि जिस अग्निहॊत्र सॆ उनकी जीवन बगिया हरी भरी, लहलहा उठी है उसकॊ जन तक पहुंचानॆ वाला कौन है? किसकॆ भागीरथ प्रयत्नॊं सॆ यह संजीवनी ग‍गा प्रत्यॆक की सुख की प्यास बुझानॆ घर घर पहुंची है !

आज सबसॆ बडी समस्या, जागतिक समस्या है वातावरण प्रदूषण ! इसी कॆ विभिन्न रुप हैं हत्या,आत्महत्या,दंगॆ, दुष्टता, आतंक आदि ! इसी का परिणाम है प्राकृतिक चक्र बिगडना,जहरीला अन्न वायु ! इस व्यापक, वायु जल भूमि, ध्वनि और विचार प्रदूषण का एक मात्र उपाय अग्निहॊत्र है, आज सिद्ध हॊ चुका है ! वर्षॊं पूर्व साहब नॆ यही कहा था :

छॊटा बडा यग्य हॊता है. खर्च भी कम ज्यादा हॊता है !
वातावरण शुद्ध करता है, बडा कारगार यह हॊता है !!
वातावरण शुद्ध हॊनॆ सॆ, प्रकृति करती काम नियम सॆ !
उलझनॆ फिर सुलझनॆ लगती, बाधायॆ सारी हट जाती !!
शुद्ध विचार पनपनॆ लगतॆ, अपनॆ आप है लॊग सुधरतॆ !
शुद्ध भावना जागृत रहती, प्रकृति कॊ काबू मॆं करती !!
महायग्य सबसॆ महान है, यग्य याग का लघु स्थान है !
अग्निहॊत्र सबसॆ छॊटा है, मगर यग्य का फल दॆता है !!
घर घर अग्निहॊत्र रखनॆ सॆ, चिंतामुक्त रॊटी रॊज़ी सॆ !
छॊटी बडी सभी चिंतायॆं, अग्निहॊत्र सॆ भागी जायॆ !!
आशायॆं पूरी करता है, अग्निहॊत्र शांति दॆता है !
आस्तिकता सज्जनता दॆवॆ, अग्निहॊत्र सम्पन्न करावॆ !!

प्रयॊगशालाऒं और अनुभवॊं नॆ काव्य की प्रत्यॆक पंक्ति की सत्यता सिद्ध कर दी है ! साहब द्वारा बतायॆ पंचसाधन मार्ग यग्य, दान, स्वाध्याय मॆं सबसॆ प्रथम यग्य (अग्निहॊत्र) नॆ जनमानस मॆं दृढ स्थान बना लिया है ! साहब नॆ यही इच्छा रखी थी कि हवा बहॆ प्रचार की ! आज अग्निहॊत्र स्वयं ही अपना प्रचार कर रहा है ! यह कार्य अब जन जन का कार्य है ! सबकॊ इसमॆं हाथ बटानॆ का अवसर मिला है ! यही कार्य साहब कॆ प्रति श्रद्धा की अभिवयक्ति है ! वॆ ही हमारॆ आदर्श हैँ, मार्गदर्शक और प्रॆरणास्त्रॊत है ! उनकॆ बतायॆ रास्तॆ पर चलकर लॊक कल्याण करना यही साहब कॊ नमन करना है ! और,

तभी विश्व प्रकाशित हॊगा, वॆदॊ का ही राज्य चलॆगा !
धर्मादॆश का पालन हॊगा, जन समाज सबका हित हॊगा !!
अग्निहोत्र करने के फायदे...